"द्वंद ज्वाल जल रही"
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द्वंद ज्वाल जल रही,
दिशा दिशा दहल रही,
काल की नगन अगन,
मगन हुई मचल रही,
दे रहा अनेक घाव, भाव का त्रिशूल भाव,
बात बेहया हुई, हजार बार छल रही ।
शैन - शैन, रैन - रैन,
नैन, चैन खो रहे,
उर्वरा जमीन पर,
विचार, मौन बो रहे,
सो रहे सभी समर्थ,
शोर व्यर्थ, चीख व्यर्थ,
हाथ, नाविकों के हाथ,
नाव जो डुबो रहे,
सिद्धि की प्रसिद्धि खास, आम को कुचल रही,
बात बेहया हुई, हजार बार छल रही ।
बेल रूप धृष्ट भ्रष्ट
साख - साख पल रहे,
भाँति-भाँति रूप ले,
समाज को निगल रहे,
फल रहे बवालबाज,
त्याग शर्म लोकलाज,
दाहिने कराल ब्याल,
नीच चाल चल रहे,
रोज - रोज, रीति - प्रीति पैंतरे बदल रही,
बात बेहया हुई, हजार बार छल रही ।
तूलिका विचित्र चित्र,
फिर वही सजा रही,
राजनीति रंग - रंग,
बाँसुरी बजा रही,
खा सके अनीति आज,
नोंच नोंच कर सुराज,
इसलिए 'विजय' अशांति,
शांति गीत गा रही,
क्रूर की कुरीति देख, नीति हाथ मल रही,
बात बेहया हुई, हजार बार छल रही ।।
@सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही