शिव,त्रिपुरेश्वर, शम्भु, महेश्वर, रुद्र ओंकारा,
बेल - पत्र और भाँग धतूरा प्रभु को है प्यारा ।।
पाप - काम संहारक प्रभु के नेत्रों की ज्वाला,
जगहित में जगदीश्वर पी लेते हैं विष प्याला,
नीलकण्ठ की जटा से निकली गंगा की धारा,
बेल - पत्र और भाँग धतूरा प्रभु को है प्यारा ।।
तन में भष्म भभूत लपेटे पहने मृगछाला,
हाथ त्रिशूल कमण्डल डमरू गले सर्प माला,
विश्वनाथ के द्वार लगाती दुनियाँ जयकारा,
बेल - पत्र और भाँग धतूरा प्रभु को है प्यारा ।।
वामभाग में सदा विराजें जग की कल्यानी,
सारी दुनियाँ कहती है प्रभु को औघड़दानी,
दर्शन पाकर हो जाता सबका जीवन न्यारा,
बेल - पत्र और भाँग धतूरा प्रभु को है प्यारा ।।
@सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही