बोझ 🥀💔 बचपन में मेरा बचपना कम,
घर में मार-पिटाई ज्यादा देखा।
कभी कोई पूछे मेरा सबसे अच्छा समय,
तो जवाब देने में समय लगता,
क्योंकि लगता कुछ हुआ ही नहीं।
जो अच्छा समय था,
वहां कहना मुश्किल था,
माँ की कोख पर भी संकोच होता।
घर में प्यार से ज्यादा,
मैंने सिर्फ रोकटोक देखी।
हर बात पर लड़क़ी होने का अहसास दिलाया गया,
और मैं चुप बैठी रही।
हर बात उनकी सिर हाँ में मिलती थी,
जैसे कठपुतली हूँ कोई।
मन कुछ करने को चाहता,
तो डर मुझे भूत सा घूरता।
पिता के प्यार से ज्यादा,
मैंने सिर्फ उनका गुस्सा देखा।
माँ की खुली हँसी में भी,
मैंने हर वक्त डर देखा।
शादी की उम्र हो गई,
कहा जा रहा—“ये हमारे सिर से उतर जा।”
जैसे कोई करज़ मैं हूँ,
मुझे बताया जा रहा कि फ़र्ज़ निभाओ।
बेटी होने का फ़र्ज़,
उनके पसंद के लड़के के साथ बंधन में।
मना किया, तो याद दिलाया गया,
हर निवाला जो माँ ने अपने हाथों से खिलाया।
✍️sana sayyad