बेटी का परायापन और नया सफर
शादी करके एक दिन सबको अपने घर जाना है,
बेटियां तो होती ही पराई हैं, कहता सारा जमाना है।
बचपन से जिसको हंस-खेल कर पाला-पोसा,
वक्त का यह दस्तूर उसी को दूर कर जाता है।
ये कैसा रिवाज है इस जालिम दुनिया का,
जो अपनी ही जिगर के टुकड़े को पराया कर जाता है।
अपना हंसता-खेलता आंगन और बचपन के ठिकाने छोड़,
वह नन्हीं कली चुपचाप विदा हो जाती है।
दूसरों के घर जाकर अपनी खुशियों की महक से,
वह पराये आंगनों को भी अपना बना लेती है।
नये घर की चौखट पर रखकर अपने कदम,
वह अनगिनत नए रिश्तों की डोर को थामती है।
कभी खुद ढल जाती है उस नए माहौल के रंग में,
तो कभी अपनों के दिलों में अपनी जगह बनाती है।