" ख़ौफ़-ए-नाख़ुदा "
ज़माने से अब कोई गिला-शिकवा रहा नहीं,
जब से मिले हो तुम मुझे दिल में दूसरा रहा नहीं।
उल्फ़त की इस राह में दर्द ही मिलता है हरदम,
इस सफ़र में और कोई भी आसरा रहा नहीं।
ज़िंदगी भी लुटा दी हमने हँस कर उन पर मगर,
उन की महफ़िल में, सिलसिला हमारा रहा नहीं।
मेरे दिल की धड़कन की सदा सुन कर जो रो पड़े,
अब इस जहाँ में इक साफ़ दिल ऐसा रहा नहीं।
अब यह ज़िंदगी भी लग रही इक सज़ा जैसी,
मौत का भी अब ख़ास कोई इरादा रहा नहीं।
जो समंदर का हो जाए उसे डूबने का डर क्या,
तेरे साथ 'व्योम' को ख़ौफ़-ए-नाख़ुदा रहा नहीं।
✍...© विनोद. मो. सोलंकी " व्योम "
जेटको (GEB) अंजार. मु. रापर.