अब मैं दुख को दुख नहीं कहता
यह एक शाश्वत सुर है
जो सुख का पड़ोसी है।
कभी पहाड़ में रहता
खिसक कर घाटी में आता,
मैदानों पर चल
मनुष्य के साथ बैठ जाता,
भेष बदल
स्वर को मधुर बना देता।
अब मैं दुख को दुख नहीं कहता
प्यार कहता हूँ,
जिसे मैंने मनभर लिया
मनभर दिया।
*** महेश रौतेला