कुरुक्षेत्र
उस कुरुक्षेत्र में भी कुछ ऐसा ही हुआ
अन्याय सीमा पार कर चुका था
तभी अर्जुन ने धनुष उठाया है
पर
यह अर्जुन कोई और नहीं है
नहीं तो अर्जुन का कोई और काहना है
जब जब दुनिया और रिश्ते कुरुक्षेत्र के मैदान बन गया
तो तब तब खुद से सवाल किया
क्या यहां तुम्हारे लिए कोई है
कोई नहीं मिला तो खुद की भीतर देखा
और तब देखा
और
जान गया की खुद के लिए खुद ही अर्जुन बनना होगा
और खुद ही कृष्णा
जो राह दिखाएं खुद को
मेरे अंदर की कृष्ण को
हमेशा बांसुरी बजाना ही पसंद है
नहीं की युद्ध करना
पर कभी-कभी युद्ध करना आवश्यक हो जाता है