कविता
वह इंसान कहीं गया ही नहीं
इंसान की मौजूदगी घर से आंगन से जिंदगी से दिल से धीरे-धीरे खत्म होती है
अभी तक यकीन नहीं कि
घर की एक सदस्य चला गया है
कभी ना वापस आने के लिए
पर लगता है
आंखों से ओझल है
पर है घर में ही कही
अपना काम करता हुआ वह इंसान
वह चला गया है
उसके होने का एहसास अब भी है
वह नहीं रहा यह बात हर किसी की जुबान पर भी है
पर किसी को लग नहीं रहा कि वह नहीं रहा
कोई चला गया है
अचानक एक लंबी यात्रा के लिए
ऐसी यात्रा पर
जहां से कोई लोड कर नहीं आता
और घर वालों को एहसास भी नहीं की
कोई कभी लौट के नहीं आने वाला
बस यह अभी धीरे-धीरे एहसास होने वाला है
एक लंबे समय के लिए
वह सबके जहेन में रहने वाला है
घर के सदस्य बनकर
अभी लगेंगे की घर में ही वह कहीं बोल रहा है
अपनों से बातें कर रहा है
जिंदगी अभी चल रही है
क्योंकि अभी यकीन नहीं की वह नहीं रहा
या नहीं है कि यकीन करना मुश्किल है
यह हो रहा है कि लगता ही नहीं कि
वह चला गया
कभी ना वापस आने के लिए
बिल्कुल सामान्य दिनों की तरह
कुछ भी हुआ नहीं
वह इंसान कहीं गया ही नही