Hindi Quote in Poem by Mahesh Gadhvi

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औरत नहीं बनना चाहेगी दोबारा किसी भी जन्म में औरत
क्योंकि थका चुके हैं उसे
ये समझौते जो उसकी परछाई बने बैठे हैं
ये निरंतन खेले जाने वाले झूठे खेल
जो उसकी संवेदना को डस रहे है।
ये संस्कार की मूरत का लेप,
ये सहनशक्ति का महिमा मंडन।
जो हमेशा उसको मृत्यु के कगार पर ले गए ।
थक चुकी है वो इन से ऊब चुकी है उनसे,
जिसके साथ वो चली कंधा मिलाकर,
जिसके साथ सांस फूलते हुए भी वो दौड़ी
वे ही ले गए उसे अग्नि परीक्षा में,।
वे ही ले गए उसे निर्लज्ज सभा में।
सदैव उपेक्षित एक ही जीवन,
आशा की अपेक्षा में उपेक्षा की आशा में
औरत फिर नहीं बनना चाहेगी दोबारा किसी भी जन्म में औरत।

"कवि आश"
महेश गढ़वी
पुलिस इंस्पेक्टर
गुजरात

Hindi Poem by Mahesh Gadhvi : 112013527
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