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{{ अनकहे जज़्बातों का सफ़र }}
अजनबी हो तुम, मगर दिल को न
जाने क्यों अपने लगते हो,
मुसाफ़िर हूँ मैं, और तुम थकी हुई
राहों का कोई सपना लगते हो,
तुमने जब जी कहा तो एक आदर
की दीवार खड़ी कर दी,
मगर मैंने चाहा था, कि वो सादगी
हो, जो रूह से जुड़ी रही,
मैं मुसाफ़िर, जिसकी कोई मंज़िल
नहीं, बस चलते जाना काम है,
पर तुमने हक़ से नाम जो दिया
अब वही मेरी नई पहचान है,
तुम्हारी उस ज़िद में, एक मासूम
सा अधिकार नज़र आता है,
जैसे कोई सूखा पत्ता, अचानक
सावन की बौछार पा जाता है,
एक नाम (P) भी आया जो लबों
तक आकर ठहर गया,
पुराना ज़ख्म था कोई जो फिर से
आँखों में उभर गया,
मैं तुम्हें पुकार न सकूँगा, उस
नाम से कुछ यादें पुरानी हैं,
मगर तुम्हारे लिए मेरे पास, एक
नई और पाक कहानी है,
तुम ज़िद्दी ही सही पर तुम्हारी ये
ज़िद दिल को छू जाती है,
मेरी वीरान सी मुसाफ़िरी में एक
मीठी सी धुन जगाती है,
सुनो हँसती रहना तुम कि तुम्हारी
हँसी ही मेरा सुकून-ए-क़ल्ब है,
मैं इक मुसाफ़िर ही भला, पर
तुम्हारा ये साथ ही मेरा अब सब है,
कोई रिश्ता हो न हो पर ये रूह का
गहरा साया है,
मैंने अपनी हर भटकन में, बस तुम
जैसा ही कोई पाया है…🤝😇
╭─❀🥺⊰╯
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#LoVeAaShiQ_SinGh 😊°
⎪⎨➛•ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी°☜⎬⎪
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यूं ही बस एक ख्याल ऐसा भी..✍🏼😊