सपने बड़े रखो📖 सपने बड़े रखो
भाग – 1 : बारिश में भीगता सपना
बारिश ज़ोरों से हो रही थी।
आसमान मानो फट पड़ा हो। काली घटाएँ, तेज़ हवा और सड़क पर बहता पानी—सब कुछ किसी गरीब की ज़िंदगी जैसा ही उथल-पुथल से भरा हुआ।
उसी बारिश में एक लड़का तेज़ कदमों से चला जा रहा था।
फटे हुए चप्पल, भीगे कपड़े और आँखों में थकान।
उसका नाम राहुल था।
राहुल कोई आम लड़का नहीं था, लेकिन उसकी ज़िंदगी बिल्कुल आम से भी बदतर थी।
वह गरीब था—इतना गरीब कि सपने देखना भी उसे कई बार गुनाह लगता था।
बारिश की बूँदें उसके चेहरे पर गिर रही थीं, लेकिन उसे फर्क नहीं पड़ रहा था।
उसे बस घर पहुँचना था।
तभी अचानक—
सड़ाक… सड़ाक…
एक चमचमाती काली कार उसके बगल से गुज़री।
इतनी तेज़ कि सड़क का गंदा पानी उछलकर राहुल के कपड़ों पर गिर पड़ा।
राहुल रुक गया।
उसने कार को जाते हुए देखा।
कार के अंदर ए.सी. चल रहा होगा…
सूखे कपड़े, मुलायम सीट, मोबाइल पर बात करता कोई अमीर आदमी…
राहुल ने गहरी साँस ली।
“काश… मेरी ज़िंदगी भी ऐसी होती,”
उसने मन ही मन कहा।
उसकी आँखों में एक सपना चमका—
बड़ा घर, अच्छी कार, माँ के चेहरे पर मुस्कान।
लेकिन अगले ही पल हकीकत ने उसे वापस ज़मीन पर ला पटका।
वह फिर चल पड़ा।
टूटा हुआ घर, टूटा हुआ दिल
जब राहुल अपने घर पहुँचा, तो नज़ारा और भी दर्दनाक था।
छोटी-सी झोपड़ी।
टपकती छत।
अंदर जगह-जगह पानी भरा हुआ।
उसकी माँ एक कोने में बैठी थी, पुराने बर्तन के नीचे पानी टपकने से रोकने की कोशिश कर रही थी।
“आ गया बेटा?”
माँ ने थकी हुई आवाज़ में कहा।
राहुल कुछ नहीं बोला।
उसने अपनी माँ के हाथ देखे—
झुर्रियों से भरे, मेहनत से कठोर हो चुके।
“आज भी काम नहीं मिला?”
माँ ने पूछा।
राहुल ने सिर झुका लिया।
“नहीं माँ…”
माँ ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसकी आँखें बहुत कुछ कह रही थीं।
बेबस माँ, बेबस बेटा।
छत से टप-टप पानी गिर रहा था,
मानो हर बूँद राहुल के दिल पर गिर रही हो।
उसी पल राहुल ने मन ही मन एक कसम खाई—
“मैं ऐसा दिन ज़रूर लाऊँगा
जब मेरी माँ को इस बारिश में डरना नहीं पड़ेगा।”
सपने देखने की हिम्मत
रात को राहुल सो नहीं सका।
बारिश की आवाज़, माँ की चिंता और उस चमचमाती कार की तस्वीर—सब दिमाग में घूम रहा था।
“क्या मैं भी अमीर बन सकता हूँ?”
उसने खुद से पूछा।
दुनिया ने उसे हमेशा यही सिखाया था— गरीब पैदा हुए हो, गरीब ही मरोगे।
लेकिन राहुल का दिल मानने को तैयार नहीं था।
उसने आँखें बंद कीं और खुद को एक बड़े ऑफिस में देखा।
सूट पहने, आत्मविश्वास से भरा हुआ।
लोग उसे “सर” कहकर बुला रहे थे।
उस रात, पहली बार राहुल ने बड़ा सपना देखा।
अगली सुबह
सुबह बारिश रुक चुकी थी।
लेकिन राहुल के अंदर कुछ जाग चुका था।
वह जानता था— रास्ता आसान नहीं होगा।
भूख, ताने, असफलता—सब झेलनी पड़ेगी।
फिर भी वह मुस्कराया।
क्योंकि उसने तय कर लिया था—
“मैं हालात का शिकार नहीं बनूँगा,
मैं अपनी किस्मत खुद लिखूँगा।🌟 प्रेरणा की चमक:
“जब परिस्थितियाँ कठिन हों, सपने बड़े रखो। अगर आज तुम्हारा कदम धीमा है, तो भी याद रखो—हर छोटी कोशिश तुम्हें उस बड़े सपने के करीब ले जाती है। राहुल की तरह, तुम्हें भी अपनी किस्मत खुद लिखनी है। अगली बार देखो कैसे राहुल की मेहनत और हिम्मत उसे उसकी मंज़िल तक ले जाएगी।