पहचान।
तुम इतने गिरो कि उठाने वाला मिल जाए,
टूटे हालात हो! अपना पराया सब खुल जाए।
मुश्किल राहों में जब अँधेरा बहुत घना हो,
कौन साथ है, ये हक़ीक़त उजागर हो जाए।
अपनेपन के दावों में अक्सर फ़रेब छुपा रहता,
सच की आँच में हर रिश्ता साफ़ नज़र आए।
जिसे अपना समझा, उसी ने दगा कर दिया,
दिल ही नहीं, जीने का सहारा भी टूट जाए।
रातों की वो तन्हाई में जब सन्नाटा गहरा हो,
आवाज़ों के बीच में सच्चा चेहरा उभर आए।
अब न शिकायत, न कोई उम्मीद दिल में रहे,
तजुर्बों का हर ज़ख्म सबक बनकर रह जाए।
'प्रसंग' सफ़र-ए-ज़िंदगी इतना समझ आया,
गिरने पर ही इंसान की पहचान निखर जाए।
- प्रसंग
प्रणयराज रणवीर