Hindi Quote in Poem by AbhiNisha

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हां हम बड़े हो गए
कविता के भाग 2

हां हमें बड़े होने दो
कविता


पर क्या हम बढ़े हैं



हमें बड़े होने दो
हमें रोने दो हमें जी भर हंसने दो
हमें हमारी राह चुन्नी दो
हमें हमारे पसंद के कपड़े पहने दो
हां हमें हमारे पसंद के जीवन साथी खुद ही ढूंढने दो




हमें अकेला चलना है
हमें सचमुच में बड़े होना है



हां हमें बड़े होने दो
हमें दुनिया से पहले खुद को संभालने दो
हां हमें बड़े होने दो
सचमुच में बड़े होने दो




बड़े होने का मतलब समाज में
बस हाइट बढ़ाना है उम्र बढ़ाना है



पर हमारे लिए हमारी हाइट
हमारी उम्र
हमारे बढ़ाने की कोई एविडेंस नहीं है


बस थोड़ी बढ़ी बात है
हम हाइट और उम्र में बड़े हो गए
पर हम अंदर से अभी बच्चे होते हैं




हमारे सर पर आप अपने ख्वाइओ की बोझ मत डालो
हमें अपने भाढ़ पहले संभालने दो
हम खुद को नहीं संभाल सकते
अभी तक


और आप अपनी दुनिया के सारे भारी भर्कभ बोझ
हमारे आंचल में लाकर रख देते हैं
हां हम अभी बड़े नहीं हुए



हमें पहले अपने पैर बढ़कर
कुछ कदम खुद तो चलने दो
हमें गिरकर
खुद संभालने तो दो
हां मैं बड़े होने तो दो



हम अभी तक बढ़े नहीं हैं
हम खुद को संभाले नहीं सकते हैं
बस सब कुछ संभालते हुए
अंदर से टूट चुके हैं



हम सब संभालते हुए
शरीर से जिंदा है
पर अंदर से मर चुके हैं




उस मासूम बच्ची को
जिसे बड़े होने चाहिए था
उसे अंदर ही दफना चुके हैं



जो दुनिया देखना चाहता था
जो खुलकर जीना चाहता था
जो हमेशा हवाओं की तरह बेहकना चाहता था



वह ख्वाहिश सबके ख्वाहिशों में आकर
दम तोड़ दिया
हां वह मासूम बच्ची
कभी बढ़ी हुई ही नहीं




बस चुप रह गई
बड़े होने कि हुड़ में
समाज के दबाव में
अपनों की उम्मीद में


बस कहीं पीछे छूट गई अपने
ख्वाहिशों के गला दबाते हुए




हां उस बच्चों को भी बड़े होने दो
उसे भी समाज में जिंदा होकर
जीने की आजादी दो
हां उन्हें बड़े होने दो





अगर यह कविता आप सबको पसंद आए तो
आगे बढ़ते रहिए
मैं आपकी प्रिय लेखकअभिनिशा❤️🦋💯

Hindi Poem by AbhiNisha : 112021956
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गांव की ज़िंदगी – सुकून का असली घर
गांव की ज़िंदगी – सुकून का असली घर

सुबह की पहली किरण जैसे ही खेतों पर पड़ती, पूरा गांव सुनहरी रोशनी से जगमगा उठता। पक्षियों की मधुर चहचहाहट, मंदिर की घंटियों की आवाज़ और ठंडी हवा मन को एक अलग ही शांति देती थी।

शहर में रहने वाली अनन्या कई साल बाद अपने दादा-दादी के गांव आई थी। शहर की भागदौड़, ट्रैफिक और मोबाइल की दुनिया में वह खुद को थका हुआ महसूस करती थी। गांव पहुंचते ही उसने देखा—हर चेहरे पर मुस्कान थी, हर घर का दरवाज़ा खुला था और हर इंसान एक-दूसरे का हाल पूछ रहा था।

एक सुबह दादाजी उसे खेतों में ले गए। हरी-भरी फसलें हवा के साथ झूम रही थीं। किसान मेहनत कर रहे थे, लेकिन उनके चेहरों पर संतोष साफ दिखाई दे रहा था।

अनन्या ने पूछा, "दादाजी, यहां लोगों के पास शहर जैसी सुविधाएं तो नहीं हैं, फिर भी ये इतने खुश कैसे हैं?"

दादाजी मुस्कुराए और बोले, "बेटी, खुशी बड़ी-बड़ी इमारतों में नहीं, बल्कि संतोष, अपनापन और प्रकृति के साथ जीने में होती है।"

उस दिन अनन्या ने बच्चों के साथ मिट्टी में खेला, पेड़ों की छांव में बैठकर कहानियां सुनीं, तालाब किनारे सूर्यास्त देखा और रात को खुले आसमान में अनगिनत तारों को निहारा।

जब वापस शहर लौटने का समय आया, तो उसके दिल में एक नई सोच जन्म ले चुकी थी। उसने समझ लिया कि जीवन का असली सुख केवल पैसा कमाने में नहीं, बल्कि अपनों के साथ बिताए गए पलों और प्रकृति के करीब रहने में है।

उसने तय किया कि चाहे वह शहर में रहे, लेकिन गांव की सादगी, प्रेम और शांति को हमेशा अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखेगी।

सीख:
"सच्ची खुशी वहीं मिलती है, जहां मन को शांति, रिश्तों में अपनापन और प्रकृति का साथ मिलता है। गांव की सादगी ही जीवन की सबसे बड़ी दौलत है।" 🌿🌾

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