तमाशा देख लेती हूँ, मैं अक्सर इन निगाहों से,
उतर कर दिल में आती हूँ, कि गुज़रूँ इन निगाहों से।
कहाँ तक तुम छुपाओगे, भला दिल की तड़प हमसे,
इबादत पढ़ ही लेती हूँ, मैं अक्सर इन निगाहों से।
ज़बाँ खामोश रहती है, तो रहने दो मगर फिर भी,
हज़ारों ख़्वाब बुनती हूँ, मैं सुंदर इन निगाहों से।
कभी जो अश्क बहते हैं, तो ये महसूस होता है,
कोई दरिया उमड़ता है, जो बाहर इन निगाहों से।
तुम्हें देखा, तुम्हें समझा, तुम्हें अपना बना डाला,
लिखी है दास्ताँ मैंने, मुकम्मल इन निगाहों से।