“लगता है आज रात बारिश ने फिर
किसी इंसान को टूटते देखा है…
तभी वो खुद बूंद बनकर उसके साथ बरस रही है,
जैसे इस रात के सन्नाटे में कह रही हो—
‘तुम अकेले नहीं हो… मैं तुम्हारे साथ हूँ।’”
“आज की बारिश कुछ अलग सी है…
जैसे उसने किसी को चुपचाप बिखरते देखा हो।
वो खुद बूंदों में बदलकर उसके साथ बरस रही है,
मानो सन्नाटे भरी इस रात में धीरे से कह रही हो—
‘मत डरना… तुम अकेले नहीं हो।’”