क्या सिर्फ नारों से सजेगी बेटियों की शिक्षा की राह?
सरकार का नारा है—'बेटी पढ़ाओ, देश बचाओ'। सुनने में यह बहुत सुकून देने वाला लगता है, लेकिन क्या किसी ने उस मध्यम और गरीब परिवार के घर की स्थिति देखी है जहाँ दो वक्त की रोटी कमाना ही सबसे बड़ी चुनौती हो?
हम सबको पता है कि सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था किस पायदान पर खड़ी है। ऐसे में जब माता-पिता अपनी बेटी का भविष्य संवारने के लिए प्राइवेट स्कूल की तरफ देखते हैं, तो वहां की फीस इतनी ज्यादा है कि वह शिक्षा नहीं, बल्कि एक 'मुनाफा कमाने वाला व्यापार' लगने लगता है।
सच तो यह है कि आधी आबादी आज भी बुनियादी जरूरतों (रोटी-कपड़ा-मकान) के लिए संघर्ष कर रही है। जब किसी बाप की जेब में बेटी की फीस भरने के लिए पैसे नहीं होते, तो उसकी आँखों का वह सपना वहीं दम तोड़ देता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या शिक्षा का अधिकार वाकई 'मुफ्त और अनिवार्य' है? या यह सिर्फ कागजों पर चलने वाली एक योजना बनकर रह गई है?
नारे लगाने से देश नहीं बदलता, देश तब बदलेगा जब हर बेटी के लिए शिक्षा का दरवाजा सिर्फ उसकी काबिलियत से खुलेगा, न कि उसके पिता की जेब की गहराई से।
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