रिश्तों का बोझ
कोई भी बहू जिम्मेदारियों से नहीं डरती, वह टूटती है,
तो बस उन कड़वे शब्दों से, जो सब कुछ निभाने के बाद भी सुनने पड़ते हैं।
वो एक बहू से बेटी बनने के लिए खुद को मिटा देती है,
पर हर बार उसके प्रेम और त्याग को, कमतर आंक दिया जाता है।
वह हंसते-हंसते हर मर्यादा को ओढ़ लेती है,
अपनों की खुशी के लिए, अपने सपनों को तोड़ देती है।
मगर जब कानों में पड़ते हैं ताने, कि "क्या किया है तुमने?",
तो रूह कांप जाती है, और आंखों से लहू बह पड़ता है।
वह दिन-रात जलती है एक मोमबत्ती की तरह,
कि घर के अंधेरे में कहीं उजाला न कम हो जाए।
पर जब शब्द चुभते हैं तीरों की तरह सीने में,
तो उसका अस्तित्व ही, धीरे-धीरे कहीं खो जाए।
क्या प्रेम और समर्पण की कीमत सिर्फ खामोशी है?
या घर की इस दीवार में, उसकी अपनी कोई बेबसी है?
लोग कहते हैं बहू को बेटी का दर्जा मिलना चाहिए, पर क्या उसे वो सम्मान भी मिलता है जो एक बेटी को मिलता है? जिम्मेदारियों के बोझ से नहीं, अपनों के कड़वे बोलों से टूटती है एक स्त्री। क्या आप भी इस दर्द को महसूस करते हैं? अपनी राय साझा करें। 🥀✨
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