"ईंट"
रिश्तों की
नींव अचानक
नहीं हिलती...
धीरे-धीरे दरकती है,
एक खामोश दरार की तरह।
हिलती तब है,
जब भरोसे की ईंट पर
शक की दरार आ जाती है,
जब वक्त की ईंट को
"फुर्सत नहीं" निगल जाता है।
जब हर कोई
अपने हिस्से की
_"ईंट"_
खींच लेता है..!!
कोई इज्जत की ईंट ले जाता है,
कोई अपनापन वाली।
कोई छोटी सी बात पर
अपना हक जताकर निकल जाता है।
और एक दिन
महल भरभराकर गिर पड़ता है...
ना शोर होता है,
ना कोई कसूरवार।
बस मलबे में दबी रह जाती हैं
वो यादें...
जिन्हें जोड़ने के लिए
किसी ने अपनी पूरी उम्र लगा दी थी।
इसलिए रिश्ते निभाना
ताजमहल बनाना है,
रोज एक ईंट लगानी पड़ती है।
वरना लोग आते हैं...
और अपनी ईंट के साथ
तुम्हारा सुकून भी ले जाते हैं।