अपमान से आत्मसम्मान तक
मेरी अच्छाइयाँ भुला दी गईं,
मेरी कमियाँ बार-बार गिना दी गईं।
मेरी सच्चाई को समझा नहीं गया,
मेरी छोटी-छोटी भूलों को ही मेरी पहचान बना दिया गया।
मेरे अस्तित्व पर प्रश्न उठाए गए,
मेरे आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाई गई।
मेरे रूप, रंग और व्यक्तित्व को आँका गया,
पर मेरे मन की पवित्रता को किसी ने नहीं जाना।
कहा गया—
तुम व्यवहारिक नहीं हो,
तुम सामाजिक नहीं हो,
तुम कमजोर हो,
तुम अधूरी हो।
बार-बार अपमान के शब्द सुनकर
मेरा मन अवश्य व्यथित हुआ,
पर मेरे आत्मविश्वास की ज्योति
कभी बुझ न सकी।
सहानुभूति के नाम पर आँसू मिले,
उपेक्षा के नाम पर तिरस्कार मिला।
फिर भी मैंने अपने आँसुओं को शक्ति बनाया,
और अपने आत्मसम्मान को कभी झुकने नहीं दिया।
इस धरती पर ऐसे भी लोग हैं,
जो बिना किसी सहारे अपनी राह बनाते हैं।
जो ठोकरों को ही अपना शिक्षक बना लेते हैं,
और संघर्षों से अपनी नई पहचान रचते हैं।
मैंने अपने अपमानों को पीछे छोड़ दिया,
अपने आत्मबल को फिर से पहचान लिया।
अब मेरी पहचान किसी की आलोचना नहीं,
मेरे कर्म, मेरे संस्कार और मेरा चरित्र होंगे।
आज मैं स्वयं से कहती हूँ—
अपमान किसी का दिया हुआ घाव हो सकता है,
पर आत्मसम्मान हमारी अपनी सबसे बड़ी शक्ति है।
जिस दिन मनुष्य स्वयं को पहचान लेता है,
उसी दिन उसके जीवन की नई शुरुआत होती है।