अब क्या बचा
जब ज़िंदगी बस ख़ामोश हो जाए,
और दिल की धड़कनों का शोर ही सबसे ऊँचा सुनाई देने लगे—
इतना ऊँचा कि अपने ही कानों को परेशान करने लगे।
जब हर बात पर साँसें गहरी होने लगें,
आँखें बस उदास ख़यालों में उलझी रहें,
और हाथ सिर थामे बैठे रहें—
या शायद ख़ुद को काँपने से रोक रहे हों।
जब ज़ुबान बोलना भूल जाए,
मगर ख़यालों में न जाने कितने शब्द जन्म लेते रहें।
जब दिमाग़ दिल को डाँटे,
ज़ुबान से कहे—“बोलो,”
काँपते हाथों से नाराज़ हो,
और हर गहरी साँस के साथ
ख़ुद भी थककर चलने लगे।
लेकिन अकेले चलते-चलते
अब दिमाग़ भी थक गया है।
उसके बस में नहीं रहा
हर चीज़ को काबू में रखना।
अब बस ज़िंदगी चल रही है—
जैसे किसी अनजाने रास्ते पर
बिना मंज़िल के चलती हुई कोई परछाईं।
न जाने कब
इन सब उलझे हुए रिश्तों के बीच
कोई रिश्ता सुलझेगा—
दिल और दिमाग़ का,
ख़ामोशी और शब्दों का,
दर्द और साँसों का।
और शायद यही बात
उस बची-खुची ख़ुशी को भी खा रही है...
क्योंकि उसने तो
इन सबको छोड़ दिया है।
अब...
क्या बचा?
- Fictional world