वो मेरी कश्ती, मेरा किनारा था कभी,
वो मेरा सारे का सारा था कभी।
लोग करते हैं न यक़ीन इस बात पर,
कि वो शख़्स हमारा था कभी।
उससे बिछड़कर न होश आया मुझे,
वो मेरा आख़िरी सहारा था कभी।
कैसे कहूँ उसके रेशमी बालों को,
अपने हाथों से मैंने सँवारा था कभी।
मैंने भी इश्क़ की राहों पर,
अपना सब कुछ हारा था कभी।
उसे देख कर ऐसा लगता था,
रब से चांद ज़मीं पर उतारा था कभी।
वक़्त ने छीन लिया मुझसे उसे,
जो मुझे जान से भी प्यार था कभी।
✍️प्रकाश कुमार