“मैं” अहंकार नहीं है
अध्याय : अहंकार, कर्म और कृतज्ञता
“मैं” अहंकार नहीं है
अक्सर कहा जाता है कि अहंकार के बिना संघर्ष नहीं हो सकता, “मैं” के बिना कर्म नहीं हो सकता। लेकिन यह बात पूरी तरह सही नहीं है।
जीवन में “मैं” का होना आवश्यक है, पर हर “मैं” अहंकार नहीं है।
बच्चा जब भूख लगने पर भोजन चाहता है, चलना सीखता है, गिरता है और फिर उठता है—वहाँ जीवन की स्वाभाविक गति है। बच्चे में “मैं” का बीज हो सकता है, लेकिन उसे उसी क्षण अहंकार कहना उचित नहीं।
जीवन के अलग-अलग चरणों में भी यही बात है।
बचपन में तमस अधिक आधार और स्थिरता देता है।
यौवन में रजस ऊर्जा, गति, प्रयास और निर्माण देता है।
और चेतना के परिपक्व होने पर सत्त्व उसी गति में विवेक और बोध लाता है।
इसलिए न तमस शत्रु है, न रजस शत्रु है, न “मैं” अपने-आप में शत्रु है।
समस्या तब शुरू होती है जब जीवन की स्वाभाविक “मैं” भावना तुलना, श्रेष्ठता और स्वामित्व में बदल जाती है।
आवश्यकता और अहंकार में अंतर
भूख लगी और भोजन प्राप्त हुआ—यह अहंकार नहीं।.... वेदांत लाइफ. कॉम
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