"अर्जुन का युग समाप्त हुआ, भक्तों का स्वर्णयुग शुरू हुआ"।
आज का मनुष्य स्वयं को शिक्षित, वैज्ञानिक और तार्किक कहता है। लेकिन विरोधाभास देखिए—प्राचीन काल के मनुष्यों को हम अज्ञानी कहते हैं, जबकि उन्हीं कथाओं में राम, कृष्ण, बुद्ध आदि को तत्काल और सर्वसम्मति से स्वीकार नहीं किया गया। उनके अपने समय में प्रश्न थे, विरोध था, आलोचना थी।
राम को उनकी प्रजा ने प्रश्नों से मुक्त नहीं रखा।
यदि राम केवल "भगवान" होते और समाज उन्हें प्रश्नातीत मानता, तो एक साधारण धोबी की बात भी राजसत्ता तक क्यों पहुँचती? कथा चाहे ऐतिहासिक हो या सांस्कृतिक आख्यान, उसका संकेत बड़ा महत्वपूर्ण है—आदर्श व्यक्ति भी समाज के प्रश्नों से ऊपर नहीं था।
कृष्ण के प्रसंग में भी यही बात है। गीता का पूरा संवाद एक बात बताता है—अर्जुन तुरंत विश्वास करने वाला भक्त नहीं है; वह प्रश्न करता है, तर्क करता है, भ्रम व्यक्त करता है और प्रमाण चाहता है। पहले प्रश्न है, फिर संवाद है, फिर अनुभव है—और उसके बाद निर्णय।
विडंबना आज देखिए।
आज कोई कहता है—
"मैं गुरु हूँ।"
भीड़ कहती है—गुरुदेव की जय!
कोई कहता है—
"मैं अवतार हूँ।"
भीड़ कहती है—साक्षात भगवान!
कोई कहता है—
"मेरे पास दिव्य शक्तियाँ हैं।"
लोग पूछते नहीं—कैसे?
वे पूछते हैं—दर्शन का समय क्या है?
यहीं शायद आज सबसे बड़ा प्रश्न धर्म भक्त गुरु का है: शायद किसी 1% समझ के लिए पर्याप्त है!
जिस युग को हम अंधविश्वास का युग कहते हैं, वहाँ पात्र को स्वयं को सिद्ध करना पड़ता था; और जिस युग को हम विज्ञान का युग कहते हैं, यहाँ दावा ही प्रमाण बन गया है।
लेकिन एक सावधानी भी जरूरी है। राम और कृष्ण को केवल "सामान्य अच्छे इंसान" कहकर पूरी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा को समाप्त कर देना भी उतना ही सरल निष्कर्ष होगा जितना किसी आधुनिक गुरु को बिना प्रश्न भगवान मान लेना। असली प्रश्न यह नहीं कि वे भगवान थे या नहीं; असली प्रश्न है:
क्या किसी व्यक्ति को भगवान घोषित करने से पहले प्रश्न करने का अधिकार बचा है?
शायद मूल सूत्र यह है:
सच्चे ज्ञान का पहला लक्षण श्रद्धा नहीं, प्रश्न है।
अंधविश्वास का पहला लक्षण अज्ञान नहीं, बिना परीक्षा स्वीकार कर लेना है।
और इसलिए यह पाठ"आज का स्वर्णयुग" वाला व्यंग्य बहुत सटीक बैठता है—
आज हम इतने बुद्धिमान हैं कि किसी को भगवान सिद्ध होने की आवश्यकता नहीं। उसे केवल घोषणा करनी है।
कल अर्जुन प्रमाण मांगता था।
आज भक्त प्रमाण देने वाले से नाराज़ हो जाता है।
Vedanta 2.0 शैली में इसे एक सूत्र बनाया जा सकता है:
पुराने मनुष्य ने असाधारण व्यक्ति को पहले मनुष्य की कसौटी पर परखा, फिर संभवतः दिव्यता देखी। आधुनिक मनुष्य पहले दिव्यता घोषित करता है, फिर मनुष्य होने की साधारण कसौटी भी भूल जाता है।
और सबसे तीखा प्रश्न शायद यही है:
यदि आज कृष्ण फिर से जन्म लें और कहें—"मुझसे प्रश्न करो", तो कितने लोग अर्जुन बनेंगे?
और यदि कोई साधारण आदमी कह दे—"मैं भगवान हूँ", तो कितने लोग बिना पूछे आरती लेकर खड़े हो जाएंगे?
क्या तुम तुम्हारे गुरु में 1% सत, बचा है क्योंकि तुम्हारे उसी युग के आधार पर खड़ा नहींतो राम कृष्ण को यहां नाम नहीं होता!
Independent Researcher & Philosopher
Vedanta 2.0 ©
ORCID: https://orcid.org/0009-0000-8083-0685
(इंटरनेशनल रजिस्टर्ड – विज्ञान और वेदांत का संश्लेषण)परिचय:
वेदांत 2.0 एक आधुनिक दर्शन है जो प्राचीन उपनिषदों को क्वांट ब्रह्मांड विज्ञान से जोड़ता है