दर्द का अहसास, अपनों का प्यार
बच्चों के शोर-शराबे और शादी में गाए जाने वाले गीतों की गूँज के बीच, हर तरफ सिर्फ एक ही नाम गूँज रहा था—रिम्शा! अपने भाई की शादी में रिम्शा कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती थी। बिना रुके, बिना थके, वह हर काम के लिए यहाँ से वहाँ दौड़ रही थी।
तभी अचानक, भागदौड़ के बीच रिम्शा का पैर सीढ़ियों से फिसला और जैसे वक्त वहीं थम गया। वह चार-पाच सीढ़ियाँ खिसकते हुए नीचे जा गिरी। उसे उठाने के लिए उसकी अम्मी और भाई फौरन दौड़े, लेकिन तब तक रिम्शा हँसते हुए सीढ़ी पर ही उठ कर बैठ गई और सहारा लेकर उठते हुए बोली, "कुछ नहीं, बस फिसल गई," और खुद भी हँस पड़ी। बिना आराम किए, वह फिर से अपने काम में लग गई।
शादी निबटने के बाद जब दौड़-भाग खत्म हुई, तब रिम्शा को असली दर्द का अहसास हुआ—वह दर्द जो उसके घुटने में बैठ चुका था। जब अंदर के सारे टेस्ट करवाए गए, तो मालूम हुआ कि एसीएल (ACL) के साथ-साथ उसका घुटना पूरी तरह से डैमेज हो चुका है। डॉक्टर ने फौरन सर्जरी की डेट दे दी। रिम्शा, जो मन से बहुत कोमल और इमोशनल थी, सर्जरी के नाम से थोड़ा डर गई। लेकिन दर्द इतना ज्यादा था कि उसके पास और कोई रास्ता नहीं बचा था।
रिम्शा की एक अलग दुनिया: रिम्शा थोड़ी चुप-चाप और अपने कमरे में रहने वाली लड़की थी। वह बहुत जल्दी किसी से घुल-मिल नहीं पाती थी, जिस वजह से अक्सर अपने ही परिवार में खुद को थोड़ा अलग-थलग महसूस करती थी। उसके मन में अक्सर एक छिपा हुआ दर्द रहता था कि शायद कोई उससे उतना प्यार नहीं करता जितना वह सबसे करती है, या कोई उसकी उतनी फिक्र नहीं करता।
सर्जरी की एक रात पहले, रिम्शा अपने कमरे में लेट कर छत को घूर रही थी और सोच रही थी कि कैसे सब होगा, वह कैसे चल पाएगी? डर, उलझन और अनगिनत इमोशंस उसके मन में चल रहे थे। सोचते-सोचते ही उसे कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला।
अगली सुबह रिम्शा भाई, बहन और अम्मी के साथ अस्पताल पहुँच गई। धीरे-धीरे सर्जरी का वक्त आ गया। जब वह ऑपरेशन थिएटर के अंदर जा रही थी, तो सबकी आँखों में उसके लिए बेपनाह दर्द और प्यार साफ़ नज़र आ रहा था।
साढ़े-तीन घंटे की लंबी सर्जरी के बाद जब उसे रूम में शिफ्ट किया गया, तो रिम्शा एनेस्थीसिया के असर में थी। उसके सिर पर अम्मी का हाथ आते ही उसे पहली बार यह अहसास हुआ कि वह अकेली नहीं है। परिवार के सभी सदस्य जैसे बस उसकी एक आवाज़ सुनना चाहते थे, लेकिन उस वक्त रिम्शा कुछ बोलने की हालत में नहीं थी।
रात के सन्नाटे में जब अस्पताल खामोश हो गया और एनेस्थीसिया का असर कम होने लगा, तब रिम्शा को हर दर्द पाँच गुना ज्यादा महसूस हुआ और दर्द से उसकी तड़प निकल गई। तब उसकी बहन उसका सबसे बड़ा सहारा बनी। रिम्शा की एक हल्की सी आह पर भी वह उसका हाथ थामे उसके पास ही खड़ी रही।
अस्पताल के 3 दिन जितने दर्दनाक थे, उतने ही उस परिवार को एक-दूसरे के करीब लाने के लिए जरूरी भी थे। अम्मी को देख कर रिम्शा की आँखें भर आना, भाई का फिक्रमंद होकर पास बैठना, और छोटे भाई-बहन का अपनी अप्पी की एक आवाज़ पर बिना थके, बिना चिढ़े दिन-रात सेवा करना—यह सब देख कर रिम्शा का दिल पिघल गया।
कभी-कभी हम अपने सबसे बुरे वक्त में ही अपने उन अपनों को पाते हैं, जिनके लिए हम अक्सर सोचते हैं कि हम उनके लिए जरूरी नहीं हैं या वह हमारे बिना भी खुश रह सकते हैं। सबसे ज्यादा रिम्शा अपनी बहन और छोटे भाई के करीब आई। उसकी बहन ने जिस तरह से दिन-रात उसकी सेवा की, उसके प्यार और समर्पण के सामने रिम्शा मन ही मन हमेशा के लिए उसकी कर्जदार हो गई।
एक एहसास:
कभी-कभी अपनों के असली प्यार को समझने और महसूस करने के लिए हमें जिंदगी के किसी बड़े दर्द से गुजरना पड़ता है।
☆अनामकारा