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समय ✨ आज मैं फिर भाग रहा हूँ, किससे और किसके लिए, कदाचित स्वयं से स्वयं के लिए। मैं एकांत के पीछे भाग रहा हूँ, या चुनौतियों से भाग रहा हूँ। भागने से होगा क्या? क्या होगा न भागने से भी? मैं (शरीर)नहीं भागूंगा, तो भी कोई है (समय) जो भागेगा। वो (समय) भाग रहा है, पर मैं नहीं। ठहराव अच्छा है, अगर सही व्यस्तता के तले हो। लेकिन ठहराव बहाना भी तो है , खुद को व्यस्त बताने का, गलत व्यस्तता जीवन को नीरस बना देती है, और नीरस जीवन भी, क्या कोई जीवन होता है ? कोशिश कर रहा हूँ तेरे बहाव (समय) में सही व्यस्तता खोजने की। कोशिश कर रहा हूँ तेरे बहाव (समय)में सही चुनौती खोजने की। कोशिश कर रहा हूँ तेरे बहाव(समय) में सही एकांत खोजने की। मैं तेरे बहाव में जाग्रत जीवन चाहता हूँ। मैं तेरे बहाव में एक जीवन युक्त आनंद चाहता हूँ। मैं तेरे बहाव में खो जाऊ उससे पहले मैं तुम्हे समझना चाहता हूँ। - यथार्थ
शांति ✨ अज्ञात मैं चाहता क्या हूँ? मैं क्या सोचकर सोचना चाहता हूँ, इल्म है तो बस इतना कि, मैं अनुचित ढर्रे में नहीं फसना चाहता हूँ। मैं (मेरा मन)आज भी विचलित होता हूँ , द्वंद के समुद्र में फसता हूँ, मैं ख़ुद को दुनिया में और दुनिया को खुद में खोजता हूँ। इसी खोज का परिणाम कि आज मैं तुम्हारे (प्रकृति)सामने हूँ। हे प्रकृति तुम कितनी शांत हो, तुम्हारे आवाज में भी शांति है। मात्र शांति होना(प्रकृति का शांत), शांत होने(मन का शांत) का परिणाम तो नहीं, अशांत होना भी, शांत होने का परिणाम तो नहीं । शांत होने का परिणाम मात्र एक ,शांत रहना (शांति में स्थापित) है। अशांति का विकल्प मात्र एक शांत रहना है। अपरिवर्तनीय शांति (प्रकृति का शांत होना), शांत होने (आंतरिक शांति) में सहायक मात्र हैं, घोर अशांति (बाहरी शोर)में भी, शांत रहना(आंतरिक शांति) यही एक विकल्प मात्र हैं। हर एक कदम शांत होने के और क़रीब लाता हैं, हर एक कदम ख़ुद को ख़ुद के और क़रीब लाता हैं। ये मुसाफ़िर इस यात्रा का निरंतर अनुगमन करता हैं, जहां वह ख़ुद को खो(बेचैनी) कर ख़ुद को(शांति) पाता हैं । ~ यथार्थ
अस्तित्व का व्यापार ✨ मेरी गुड़िया, परी, चिरैया— समाज ने गढ़े हैं ये तमाम नाम। नामकरण की इस प्रक्रिया से, भूल की उसने तुम्हारे अस्तित्व का अधिपति बनने की। रचा गया इसी नामकरण से झूठे प्रेम का प्रथम अध्याय, और बुनी गईं वे मुखौटा-युक्त कहानियाँ— सुशील, शांत और ‘चरित्रवान’ होने की। समाज बना पहला ‘चोर-पहरेदार’, जिसने सिखाया—अकेली रहो, दूर रहो, उन सबसे जो अनजान हैं। जबकि वे पहरेदार स्वयं... तुम्हारी सुशीलता और शांति का लाभ लेते रहे। पहरेदारों का यह मुखौटा बना रहे, इसलिए वे तुम्हें एक अनजान को सौंप आए। एक ऐसा ‘अनजान’, जहाँ न प्रेम है, न बोध, न ज्ञान। यदि पहरेदार यह आयोजित विवाह न रचाते, न होता इसमें वह व्यापारिक लेन-देन; न होता पहरेदारों के कानून में विवाह का अर्थ—शारीरिक संबंध, तो क्या फिर कोई विवाह हो पाता? क्या विवाह के नाम पर यह संभोग बाध्य हो पाता? क्योंकि प्रेम के मार्ग से किसी के अंतर्मन तक पहुँचना, साधारण नहीं है। प्रेम से, स्त्री-पुरुष के शरीर तक की यात्रा, सुलभ नहीं है। पर पहरेदारों ने एक चाल चली, और शरीर तक पहुँचना... बहुत आसान कर दिया। आयोजित विवाह ! - कपिल तिवारी "यथार्थ"
मालकियत ✨ तुमने मेरे साथ जो किया, शायद ही कोई करता। मैं तुमसे नहीं डरा था, कदाचन ही कभी डरता। तुमने सज्जनता की आड़ में खुद को छिपाया हैं, बड़े - बड़े वार्तालाप करके श्रेष्ठता का प्रदर्शन किया हैं। संयोग से तुम्हारे पास मकान हुआ और तुम उसके स्वामी बन बैठे, हो किराएदार तुम भी समय के और तुम स्वामित्व समझ बैठे। फिर क्यों तुम्हारे मन में किरायेदारों के लिए ईर्ष्या उठती हैं? फिर क्यों किराया क्षणिक देरी पर स्वामित्व की भावना उठती हैं? तुम सिर्फ मकान के स्वामी हो किसी के जीवन के नहीं, मैं सिर्फ किराएदार हूँ तुम्हारे संपत्ति का वारिस तो नहीं। जिन्हें तुम निम्न समझते हो, कहीं उनकी भी अलकापुरी होगी, जिन्हें तुम निम्न समझते हो, कभी उनके भी सहन की सीमा टूटेगी। उसमें तुम्हारा मकान और मालकियत ध्वस्त हो कर रह जाएगी, तुम्हारे पोषित अहंकार की इच्छाएं सब ध्वस्त होकर बिखर जाएगी। तुम अपना गुरूर दिखा कर किसी से वसूली करके खुद को महान समझते हो, कुछ किताबें पढ़के, उन्हीं के अहंकार में गोते लगाकर खुद को विद्वान समझते हो। बनाई होगी तुमने अपनी पद प्रतिष्ठा संपत्ति किसके लिए, उन चन्द लोगों की याचिका पाने के लिए, या जो बेहोशी से संभोग का परिणाम हुआ उनके लिए, या चंद अंतिम शांति के स्वार्थ के लिए। बनाई होगी तुमने जिस स्वार्थ से परिणाम अंततः बुरा होगा। तुमने खुद को अहंकार के रत्नों से सजाया, तुमने खुद को ही खुद के मूल्यों से सजाया। सजालो, बनालो, पोषित कर लो ख़ुद को अंत अंततः ठीक न होगा। मैं तुम्हारी सत्ता का विध्वंश मांगता हूँ, जिन्हें तुम निम्न समझते हो उनसे विद्रोह मांगता हूँ । मिटे तुम्हारी सत्ता तुम भी मिटो। मिटे वो अयोग्य लोग जो मालकियत सजाए बैठे हैं, मिटे वो जो अपने अहंकार सजाए बैठे हैं। मैं अंतिम में तुम्हारी अशांति से शांति मांगता हूँ, मैं तुम्हारे अहंकार का विध्वंश मांगता हूँ। शांति! शांति! शांति! - कपिल तिवारी "यथार्थ"
सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर है। - यथार्थ
समानता ✨ जन्म तुमने लिया और मैंने भी, परिभाषित किया समाज ने तुम्हें भी मुझे भी। समय के किस कालखंड में यह परिभाषा बैठी, लड़का लड़की के भेद की सीमा बैठी। पढ़ा - लिखा कर आजादी दी मुझे, तुम्हे भी, पर थोड़ा कम। अपनत्व ज्यादा मिला मुझे, तुम्हे भी, पर थोड़ा कम। मान्यता श्रेष्ठ होने की मिली मुझे, तुम्हे भी, पर थोड़ा कम। थोड़ा कम - थोड़ा कम की परंपरा से जब मन खिन्न हो उठा, स्थान,समय, जन्म एक प्रक्रिया से, फिर ये भेद क्यों ? ये प्रश्न उठा। ये भेद ये सीमाएं बनाई होगी क्या? जन्मदाता ने, किसी को कम किसी को ज्यादा उत्कृष्टा की संभावना दी होगी क्या? जन्मदाता ने। थोड़ा कम, थोड़ी सीमाएं करके तुम्हे (लड़की)क्या मिला? मिला उस समाज को जिसने इस परंपरा का श्री गणेश किया। होगा स्वार्थ किसी का किसी को दबाने में, होगा स्वार्थ अपनी गलती को सत्य बताने में। कम-कम जब दबाव तीव्र होता हैं, तभी समय की धारा में बदलाव होता हैं। ख़ुद को किसी का स्वामित्व समझने वाले, समानता का पहर लाना होगा, अन्यथा परिवर्तन में स्वामित्व झुका किसी और के हाथ तब भी परिणाम अलग न होगा। जब तक किसी में भी स्वामित्व की भावना होगी, कठिन परिश्रम के बाद भी समानता न होगी। समानता के लिए प्रतिपल समान होना आवश्यक हैं, थोड़ा कम - थोड़ा कम की भावना का खंडन होना आवश्यक हैं। -कपिल तिवारी "यथार्थ"
मैं लड़की हूँ ✨ जन्म लेते ही, बचपन के पहले पड़ाव से ही, तुम घर के कामों में हाथ बटाओगी। तुमको सीखना होगा बो हर काम, जो मैं करती आई हूँ, खाना बनाना, परोसना, और अंत में खाना भी, जो मैं करती आई हूँ। तुम्हारे खिलौने , कपड़े, बो सब मैं तय करूंगी साथ पिता भी, अपनी पुरातन अक्ल को तुममें विस्तार दूंगी मैं साथ पिता भी। हमारी अपूर्ण कामनाएं तुम्हारा लक्ष्य है , चरित्रवान अगर बंधन हैं तो सब सहना तुम्हारा भाग्य है। तुम विद्रोह करोगी, असभ्य कहलाओगी। समाज समय के साथ अपनी स्वार्थयुक्त परिभाषा सीखता हैं, पीछे, निम्न, कमजोर, चरित्रवान,सीमाओं का भेद सिखाता हैं। प्रतिपल मन समाज के बंधनों से सामंजस्य स्थापित करने लगता हैं, समाज को अस्वीकार करते हुए भी मन स्वीकर करने लगता हैं। प्रतिपल उसकी आंतरिक महत्वाकांक्षाएं दम तोड़ने लगती हैं , वर्तमान स्थिति को अपनी नियति का भाग्य समझने लगती हैं। कदाचित सब ऐसे ही जीते हैं, उत्कृष्टता किसी और के लिए होती हैं। उपस्थित जिन्दगी को स्वीकर करने लगती हैं , शांति और जिज्ञासा उत्कृष्टा को नकारने लगती हैं। अपनी दशा को अपना साथी बना लेती हैं , यही जीवन का सत्य हैं स्वीकार्य कर लेती हैं। जीवन यूं ही फिसल जाता हैं, बिना विद्रोह,उत्कंठा, जिज्ञासा के। जीवन और मृत्यु का भेद खत्म होने लगता हैं, और यही जीवन अच्छा लगने लगता हैं। -कपिल तिवारी "यथार्थ"
अपूर्णता✨ तुम ऐसे ही उम्र में बड़े हो जाओगे, अगर तुम नहीं सचेत हुए , तो तुम्हारा अहंकार तुम्हारी बुद्धि का उपयोग व्यर्थ का कुतर्क करने में माहिर होता जाएगा। तुम बड़े बनोगे सिर्फ धन, दौलत, पद ,प्रतिष्ठा साथ अहंकार से भी। तुम्हारे पास चंद रुपया आएगा, फिर तुम्हारी और ज्यादा चंद रूपए वालों से पहचान होगी। फिर तुम और चंद के पीछे भागोगे। भागों जितना हो सके भागों, निकल भी जाओ आगे सबसे अहंकार में भी इतना भागों। जब तुम्हारी देह का अंत होगा , जिसने तुम्हे भगाया है उसका नहीं। शरीर थक गया लेकिन पाओगे कि भगाने बाला नहीं। अंत तुम्हारा इसी कशिश में होगा कि काश और भाग लेता, अंत इसी बेचैनी में होगा कि काश कुछ और जीवित रह लेता। मिला था अवसर पूर्ण , आनंद, का लेकिन तुम्हे अपूर्णता से मोह था। तुम अपूर्ण थे और ऐसे ही रहोगे, अंत तुम्हारा इसी अपूर्णता के साथ होगा। तुमको जो हो जाना चाहिए था वो तुम नहीं हुए, उत्कंठा, उत्कृष्टा, जिज्ञासा, खुद के प्रति कर सकते.. नहीं किए। अपूर्णता को पूर्णता से बदलने का विकल्प मिला.. नहीं लिए, अब जो है उसका कारण चुनाव है तुम्हारा जो तुम लिए। -कपिल तिवारी "यथार्थ"
पढ़े लोग ✨ ज्यादा पढ़े -लिखे लोगों का दिमाग खराब होता है। ज्यादा जिज्ञासा होती हैं, बिना जाने कुछ मानते नहीं हैं। सबके सामने सिर न झुकाते है, लेकिन वो सर झुकना जानते हैं। वो प्रश्न उठाते है ज्ञान, बोध, कौशल पर भी, अगर यह सब गलत है तो हा, पढ़े- लिखे लोगों का दिमाग खराब होता है। हर उस चीज में जिज्ञासा करते हैं जो लोग माने बैठें हैं, प्रश्न खड़ा करते हैं हर वो चीज में जिसमें वो कर सकते हैं। वो सोचने ज्यादा लगते हैं, उसकी बुद्धि अहंकार की ग़ुलाम नहीं होती है। समाज को वो पढ़े- लिखे रास न आयेंगे जो उसी पर प्रश्न खड़ा करें, समाज के पास प्रत्युत्तर है सिर्फ उनके जो उसे और विस्तार दे सके। प्रश्न खड़ा किया समाज पर, तब प्रतिउत्तर के बदले खड़ा हुआ समाज आप पर, ज्यादा पढ़े - लिखे लोग समाज को रास नहीं आते है। वो प्रश्न उठाते है - जीवनसाथी, सही जीवन, अहंकार, अस्तित्व, बेचैनी, और सही गलत पर भी। वो विवेकपूर्ण समानता देखते है और असमानता भी। जीवन कैसा भी हो शांति, सत्य, चैन की खोज में निकलते है चाहे कुछ हो य न भी। अगर न पढ़ो, न जानो, न समझो जैसे हो बने रहो। समाज के निर्माण को स्वीकार्य करो, न जानो खुद को न समाज को न सत्य को जैसे हो बने रहो। न करो मान्यताओं का खंडन, न चुनो आजादी भी। तुम समाज के स्वार्थों को पूरा करो और समाज तुम्हारे भी। क्या तुम्हें ये स्वीकार्य है? अगर नहीं तो पढ़ो, जानो, समझो। जानो सही गलत का भेद, जानो खुद के अज्ञान का भेद। जियो खुद जैसा तुम चाहते हों, सर झुके तो सिर्फ सत्य को, खड़े रहो असत्य के खिलाफ। जानो वो हर चीज जो मान्यता में खड़ी है। जानो खुद के अस्तित्व को, जितना जो कुछ जान सकते हो जानो। मिल जाए पंचभूतों में तुम्हारा पंचभूत, इससे पहले जितना जान सकते हो जानो। अगर जानना गलत है, तो हा पढ़े- लिखे लोगों का दिमाग खराब होता हैं, पढ़े -लिखे लोग खुद को और समाज को सही राह ले जाते है। -यथार्थ
✨ वो स्थान कितने सुंदर होते है! वो स्थान कितने सुंदर होते है! जहां बनावटी भव्यता नहीं वास्तविक दिव्यता होती हैं, जहां भीड़ नहीं होती होते हैं तो बस चंद सभ्य लोग, जहां प्रकृति खुद में पूर्ण हो साथ न हो भोग, जहां मनुष्य मनुष्यता का अवलोकन कर सके। वे स्थान कितने सुंदर होते है! जहां सुकून खुद शांति से बैठ सके, जहां खुद के अस्तित्व का आभास हो सके, जहां दृश्य और दृष्टा का ज्ञान हो सके, जहां तथ्यों के साथ प्रकृति का भान हो सके। वे स्थान कितने सुंदर होते है! जहां पैर खुद ठहर जाए, ठहरे हुए पैरों के साथ विचलित विचार भी, जहां उत्कृष्टा, बोध, सफलता की नई परिभाषा जन्म लेती हो जहां यात्रा आरंभ हो खुद की खुद तक के लिए जहां मौन जन्म ले और उसमें विलीनता भी वे स्थान कितने सुंदर होते है। - यथार्थ
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