मैं लड़की हूँ ✨
जन्म लेते ही,
बचपन के पहले पड़ाव से ही,
तुम घर के कामों में हाथ बटाओगी।
तुमको सीखना होगा बो हर काम, जो मैं करती आई हूँ,
खाना बनाना, परोसना, और अंत में खाना भी,
जो मैं करती आई हूँ।
तुम्हारे खिलौने , कपड़े, बो सब मैं तय करूंगी साथ पिता भी,
अपनी पुरातन अक्ल को तुममें विस्तार दूंगी मैं साथ पिता भी।
हमारी अपूर्ण कामनाएं तुम्हारा लक्ष्य है ,
चरित्रवान अगर बंधन हैं तो सब सहना तुम्हारा भाग्य है।
तुम विद्रोह करोगी, असभ्य कहलाओगी।
समाज समय के साथ अपनी स्वार्थयुक्त परिभाषा सीखता हैं,
पीछे, निम्न, कमजोर, चरित्रवान,सीमाओं का भेद सिखाता हैं।
प्रतिपल मन समाज के बंधनों से सामंजस्य स्थापित करने लगता हैं,
समाज को अस्वीकार करते हुए भी मन स्वीकर करने लगता हैं।
प्रतिपल उसकी आंतरिक महत्वाकांक्षाएं दम तोड़ने लगती हैं ,
वर्तमान स्थिति को अपनी नियति का भाग्य समझने लगती हैं।
कदाचित सब ऐसे ही जीते हैं,
उत्कृष्टता किसी और के लिए होती हैं।
उपस्थित जिन्दगी को स्वीकर करने लगती हैं ,
शांति और जिज्ञासा उत्कृष्टा को नकारने लगती हैं।
अपनी दशा को अपना साथी बना लेती हैं ,
यही जीवन का सत्य हैं स्वीकार्य कर लेती हैं।
जीवन यूं ही फिसल जाता हैं,
बिना विद्रोह,उत्कंठा, जिज्ञासा के।
जीवन और मृत्यु का भेद खत्म होने लगता हैं,
और यही जीवन अच्छा लगने लगता हैं।
-कपिल तिवारी "यथार्थ"