Deewane ki Diwaniyat - 1 in Hindi Love Stories by kajal jha books and stories PDF | दीवाने की दिवानियत - एपिसोड 1

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दीवाने की दिवानियत - एपिसोड 1

एक ही शहर, दो दुश्मन और वो पुरानी चोट
दरभंगा की तपती दुपहरी में राजवीर राठौर और भानु प्रताप ठाकुर की दोस्ती की मिसाल दी जाती थी। दोनों का रसूख ऐसा कि परिंदा भी पर न मारे। राजवीर सरकारी कायदे-कानून को मानने वाले इंसान थे, जबकि भानु प्रताप ठाकुर के लिए उनका शब्द ही कानून था।
उस दिन हवेली के बगीचे में 8 साल का पृथ्वी और 5 साल की सनाया खेल रहे थे।
"पृथ्वी! दम है तो पकड़ के दिखाओ!" सनाया अपनी फ्रॉक संभालते हुए तेजी से भागी।
पृथ्वी उसके पीछे दौड़ रहा था और बार-बार चिल्ला रहा था, "सनाया, रुक जा! गिर जाएगी तो चोट लगेगी, फिर मत रोना।"
लेकिन सनाया कहाँ सुनने वाली थी? वो बस भागती रही और अचानक उसका पैर एक ईंट से टकराया। वो धड़ाम से गिरी और उसके घुटने से खून निकलने लगा।
पृथ्वी फौरन उसके पास पहुँचा। उसे रोते देख पृथ्वी की भी रूह कांप गई। "बोले थे ना इतना तेज मत भागो! देखो, कितना खून निकल रहा है।" उसने अपने रुमाल से उसका घाव दबाया, पर सनाया के रोने की आवाज़ सुनकर दोनों के पिता वहां दौड़ते हुए आ गए।
राजवीर जी ने सनाया को गोद में उठाया और हवेली के अंदर ले गए। भानु प्रताप ठाकुर अपनी बेटी के पैर से टपकता खून देखकर एकदम सुन्न हो गए। उनके लिए उनकी बेटी उनकी जान थी। वहीं से माहौल थोड़ा भारी होने लगा।
दुश्मनी की शुरुआत
सनाया को कमरे में सुलाने के बाद जब दोनों दोस्त बाहर बरामदे में बैठे, तो बात छिड़ गई। शहर के पास वाली एक बड़ी जमीन पर सरकार एक बड़ा गोदाम और स्टेशन बनाना चाहती थी। राजवीर जी उस प्रोजेक्ट के इंचार्ज की तरह काम देख रहे थे।
भानु प्रताप ने खैनी रगड़ते हुए कहा, "राजवीर, वो जमीन हमारे कब्जे में है। वहां हम अपना मील (Mill) डालेंगे। तुम सरकारी कागज पर दस्तखत कर दो कि वो जमीन बंजर है और किसी काम की नहीं।"
राजवीर जी ने साफ मना कर दिया। "भानु, ये नहीं हो सकता। वो जमीन सरकार की है और वहां स्टेशन बनेगा तो पूरे जिले का भला होगा। हम अपनी दोस्ती के लिए पूरे शहर का नुकसान नहीं कर सकते।"
बस यही बात भानु प्रताप को चुभ गई। उन्हें लगा कि राजवीर उनके इलाके में रहकर, उनकी ही दोस्ती खाकर उन्हें ही आँख दिखा रहा है।
"राजवीर, तुम भूल रहे हो कि तुम किसके सामने खड़े हो। कानून किताबों में होता है, इस जमीन पर ठाकुरों का फैसला चलता है।" भानु प्रताप की आवाज़ गूँज उठी।
राजवीर जी भी अपनी बात के पक्के थे। "कानून सबके लिए बराबर है भानु। चाहे तुम हो या मैं।"
उस रात के बाद बात बिगड़ती चली गई। भानु प्रताप ने अपनी गुंडागर्दी के दम पर काम रुकवाने की कोशिश की, और राजवीर जी ने पुलिस बल बुलाकर उनके आदमियों को खदेड़ दिया। जो दोस्ती सालों पुरानी थी, वो अब एक-दूसरे की जान लेने पर उतारू हो गई।
पृथ्वी का दरभंगा छोड़ना
भानु प्रताप ठाकुर ने कसम खा ली कि वो राजवीर के परिवार को चैन से नहीं रहने देंगे। रोज़ाना धमकियाँ, घर के बाहर गुंडों का घेरा—हालात बहुत खराब हो गए। राजवीर जी ने फैसला किया कि वो दरभंगा नहीं छोड़ेंगे, लेकिन अपने बेटे पृथ्वी की जान और पढ़ाई के लिए उसे यहाँ से दूर भेज देंगे।
8 साल के पृथ्वी को समझ नहीं आ रहा था कि कल तक जो भानु अंकल उसे अपनी गोद में बिठाते थे, आज उनके आदमी उसके घर पर पत्थर क्यों फेंक रहे हैं।
जाने से पहले पृथ्वी छिपकर सनाया से मिलने गया। सनाया के पैर में अभी भी पट्टी बंधी थी।
"हम जा रहे हैं सनाया," पृथ्वी ने उदास होकर कहा।
सनाया ने गुस्से में अपना मुंह फेर लिया। उसके कान में उसके पिता ने ये भर दिया था कि पृथ्वी के बाप ने उनकी बेइज्जती की है। "चले जाओ यहाँ से! तुम लोग गंदे हो।"
पृथ्वी के दिल पर वो बात लग गई। उसने मन ही मन ठान लिया कि वो एक दिन वापस आएगा और इस 'गुंडागर्दी' को कानून के दम पर खत्म करेगा।
25 साल बाद...
पृथ्वी दरभंगा से दूर मुंबई में अपनी पढ़ाई पूरी करता रहा। उसने कड़ी मेहनत की और पुलिस फोर्स जॉइन की। मुंबई की चकाचौंध में भी उसे वो दरभंगा की गलियां और सनाया के पैर की वो चोट हमेशा याद रही।
अब पृथ्वी 26 साल का एक सख्त और निडर ऑफिसर बन चुका था। उसका ट्रांसफर वापस बिहार के उसी दरभंगा जिले में हुआ।
जब वो वर्दी पहनकर स्टेशन से बाहर निकला, तो हवा में वही पुरानी नफरत की गंध थी। उसे पता चला कि इन 25 सालों में ठाकुर परिवार का खौफ और बढ़ गया है। और अब सनाया ठाकुर, जो कभी मासूमियत से भागती थी, वो अब अपने पिता की सबसे बड़ी ताकत और इस गुंडागर्दी की 'रानी' बन चुकी है।
पृथ्वी ने अपनी गाड़ी का शीशा नीचे किया और उस हवेली की तरफ देखा जहाँ कभी वो खेला करता था।
"खेल तो अब शुरू होगा, सनाया ठाकुर।" पृथ्वी के चेहरे पर एक ठंडी मुस्कान थी यह कहानी आपको कैसी लगी