घर जो कभी बेचा नहीं गया
शहर के सबसे चमकदार इलाके में, जहां हर तरफ़ गगनचुंबी इमारतें आसमान को चीर रही थीं, वो एक पुराना सा घर अकेला खड़ा था।
चारों ओर कांच की दीवारें, नीली रोशनी वाली बालकनियां, और लग्ज़री कारों की कतारें।
बीच में वो घर – टूटी-फूटी खिड़कियां, दीवारों पर उखड़ी पेंट, और छत पर जंग लगी टिन की चादर।
लोग गुजरते हुए मुस्कुराते, फुसफुसाते –
“मालिक पागल है यार। करोड़ों की ज़मीन छोड़ रखी है। बस बेच दे तो अमीर हो जाए।”
कोई कहता, “शायद कोई कानूनी पचड़ा है।”
कोई हंसता, “या फिर भूतों का घर है।”
लेकिन किसी ने कभी उसका दरवाजा खटखटाने की हिम्मत नहीं की।
एक दोपहर, एक युवा रियल-एस्टेट डीलर आया। नाम था विक्रम।
नया-नया बिजनेस, बड़ा सपना।
उसे लगा – ये घर तो खाली है, मालिक को थोड़ा दबाव देकर सस्ते में खरीद लूंगा, फिर फ्लैट बनवाकर करोड़ों कमा लूंगा।
वो अकेला आया।
दरवाजा खुला था – जैसे किसी ने इंतज़ार किया हो।
विक्रम अंदर घुसा।
धूल की परत, पुरानी खुशबू, और एक अजीब-सी खामोशी।
पहला कमरा – बच्चों का बेडरूम था।
दीवार पर पेंसिल से बने ऊंचाई के निशान।
हर निशान के नीचे तारीख और नाम –
“राहुल – 5 साल”
“रिया – 3 साल”
“राहुल – 10 साल”
“रिया – 8 साल”
निशान ऊपर-ऊपर जाते गए, फिर रुक गए।
एक जगह लिखा था – “पापा, अब मैं तुमसे लंबा हो गया!”
विक्रम का गला सूख गया।
उसने हाथ लगाया उन निशानों को।
जैसे कोई बच्चा अभी भी वहां खड़ा हो, मुस्कुरा रहा हो।
फिर किचन।
पुरानी गैस स्टोव, जला हुआ बर्तन अभी भी रखा था।
जैसे किसी ने चाय बनाई हो, फिर आग लग गई हो, और सब छोड़कर भाग गए हों।
बर्तन के किनारे पर छोटा-सा हाथ का निशान – शायद किसी बच्चे ने डरते हुए छुआ था।
विक्रम को लगा जैसे अभी भी धुआं उठ रहा हो, और कोई औरत चिल्ला रही हो – “राहुल! रिया! बाहर आओ!”
आखिरी कमरा – मास्टर बेडरूम।
खिड़की से शहर की चमक आ रही थी, लेकिन अंदर अंधेरा।
दीवार पर एक पुराना फ्रेम टंगा था।
कांच टूटा हुआ, लेकिन अंदर लिखावट साफ़।
“अगर कभी ये घर बेचना पड़े,
तो समझ लेना
यादें मर चुकी हैं।
तब बेच देना।
वरना मत छूना।”
विक्रम बैठ गया फर्श पर।
उसने फोन निकाला, मालिक का नंबर डायल किया।
रिंग हुई।
उधर से एक बूढ़ी, थकी आवाज़ आई – “हैलो?”
विक्रम बोला, “सर, मैं विक्रम हूं। रियल एस्टेट से। आपके घर के बारे में...”
उधर से हल्की हंसी।
“तुम भी आए हो? हर साल कोई न कोई आता है।”
विक्रम ने पूछा, “सर, आप यहां क्यों नहीं रहते?”
जवाब आया – “क्योंकि मैं यहां हर साल आता हूं। एक दिन के लिए।
उस दिन मैं मां की आखिरी हंसी सुनता हूं,
पिता की आखिरी डांट खाता हूं,
और अपने बच्चों की दौड़ती हुई आवाजें।
फिर चला जाता हूं।
क्योंकि अगर मैं रोज रहूंगा, तो यादें धुंधली पड़ जाएंगी।
एक दिन के लिए काफी हैं।”
विक्रम चुप हो गया।
फोन कट गया।
वो उठा, घर से बाहर निकला।
शहर की चमक फिर से आंखों में चुभी।
उसने अपना बिजनेस कार्ड फाड़ दिया।
फिर मुड़ा, घर की तरफ देखा।
आज भी वो घर खड़ा है।
चारों ओर नई इमारतें ऊंची होती जा रही हैं।
लेकिन वो घर नहीं बिका।
ना बिकेगा।
क्योंकि कुछ चीजें पैसे से नहीं बिकतीं।
ना मजबूरी से।
ना लालच से।
वो घर एक ज़िद है।
एक याद है।
एक वादा है – कि कुछ चीजें हमेशा के लिए रहनी चाहिए।
भले ही दुनिया कितनी भी तेज़ भागे।
अगर तुम्हारे पास भी ऐसा कोई घर है –
कोई पुरानी याद, कोई पुरानी चिट्ठी, कोई पुराना फोटो –
जिसे तुम कभी नहीं बेचोगे,
तो बताना।
क्योंकि वो घर सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं होता।
वो तुम्हारा दिल होता है।
और दिल कभी बिकता नहीं। ♡