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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
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सोरठा छंद
*********
बादल गरजे खूब, मन फुहार से भीगता।
मस्ती में सब डूब, छाया हर्षोल्लास है।।

गिरने लगी फुहार, मगन मन लगा डोलने।
गाते राग मल्हार, आया सावन मास है।।

उलझन सबकी एक, नहीं सोचते हम सभी।
खींचें चित्र अनेक, अपने-अपने स्वार्थ में।।

सबकी उलझन एक, व्यर्थ पीटना माथ है।
अपना आप विवेक, सभी लगाते स्वयं का।।

कैसी हो सरकार, आप हमसे मत पूछो।
करते नहीं विचार, वोट डालते समय तो।।

कैसी हो सरकार, भला आज क्यों पूछे।
सोचे बिना जमीर, कल को बेचा आपने।।

भूली बिसरी बात, करें भला हम याद क्यों।
बिगड़ जायेगी रात, चिंता करना व्यर्थ है।।

भूली बिसरी बात, जीवन के अभियान में।
मत समझो तुम घात, इसमें ऐसा कुछ नहीं।।

भूली बिसरी बात, अपने ही अंदाज में।
कुछ खेलें जज्बात, और कुछ हमें रुलाते।।

प्रेम जगत का सार, कौन भला अब मानता।
झूठा है आधार, चीख-चीख कर कह रहा।।

सभी बड़े विद्वान, आप नहीं हैं समझते।
भूल प्रेम का ज्ञान, बने मूर्ख हैं घूमते।।

सबसे रखना मेल, इतनी सी तो बात है।
बस रचना मत खेल, कठिन आपको जब लगे।।

आओ खेलें खेल, कहा मित्र यमराज ने।
शीश लगाएं तेल, दिल दिमाग ठंडा रखें।।

सबसे रखना मेल, अति उत्तम आधार है।
अगर मानिए जेल, खुशियों की सौगात का।।

बहुत हो चुका खेल, बंद करो अब खेलना।
सबसे रखना मेल, यही समय की माँग है।।

कैसे भरें उड़ान, कितना किया विचार है।
मुफ्त चाहते दान, फिर चिंता क्यों कर रहे।।

होता है अभिमान, इतना भी अच्छा नहीं।
कैसे भरें उड़ान, आप किसी से पूछ लो।।

क्यों बनते नादान, मूरख बनकर तुम भला।
कैसे भरें उड़ान, नहीं सोचते इसलिए।।

जाओ बेचो तेल, हो सवर्ण तो क्या करें।
बने घूमना रेल, मरती जाती आस है।।

होना आज सवर्ण, क्या मेरा अपराध है।
जैसे बेबस कर्ण, हमतो ऐसे हो गए।।

जता रहे अहसान, करते जो सहयोग वो।
जब अटकी थी जान, भूले अपना दौर निज।।

बेवकूफ इंसान, आया ऐसा दौर अब।।
लोग कहें नादान, भूल रहा अहसान वो।।

रहते मद में चूर, इतना उनको दंभ है।
घाव बने नासूर, किसको देंगे दोष जब।।

कहें मित्र यमराज, घाव बने नासूर क्यों।
लगे कोढ़ में खाज, भूल नहीं ऐसा करो।।

अपनों से लाचार, आप सब जान रहे हो।
घाव बने नासूर, बने हुए बेवकूफ तुम।।

हुए सभी बीमार, किया प्रकृति ने वार जब।
व्यर्थ द्रवित उद्गार, बस्ती हुई तबाह तब।।

बस्ती हुई तबाह, देते ईश्वर दोष क्यों।
करिए आप निबाह, जो होना था हो गया।।

प्रकृति भी है दंग, देखी मानव वेदना।
मानवता बदरंग, पर वो भी है जानती।।

लेना सरल उधार, करते कहाँ विचार हम।
हो जाते लाचार, देने का जब वक्त हो।।

कल जब दिया, उधार, बोध नहीं था तब हमें।
खुद बेबस लाचार, देख रहा हूँ आज मैं।।

मिले कहाँ आराम, खुद बनते दुश्मन जहाँ।
होने से बदनाम, प्रभु जी हमें बचाइए।।

मिले कहाँ आराम, सब जब सबको कोसते।
लगे नहीं कुछ काम, इससे अच्छा क्या भला।।

शब्दों का प्रहार, इतना भी करिए नहीं।
तुम मुक्का दो चार,इससे अच्छा मार दो।।

मानव आप विकार, नहीं छोड़ते क्यों भला।
नाहक नित्य शिकार, इसीलिए तो हो रहा।।

अपने सभी विकार, गुरू चरण में डाल दो।
तब होगा उद्धार, बिना किसी संदेह के।।

करिए कभी न भेद, प्रेम सहित मिलकर रहें।
यदि है कोई खेद, खुलकर तुमउसको कहो।।

रहो सदा खुशहाल, करो कभी मतभेद तुम।
करना पड़े मलाल, कभी आपस में लड़कर।।

चिंता करते यार, जीत हार की क्यों भला।
बाद करो तकरार, कुछ तो पहले कीजिए।।

मातु-पिता का मान, करना हमको चाहिए।
रहिए सीना तान, बिना किसी से भी डरें।।

तब क्यों जीते आप, जीने का जब गुण नहीं।
और करो मत पाप, सीखो जीवन सार तुम।।

रहे सदा ही वास, बड़े-बुजुर्गों का जहाँ।
ईश्वर करें प्रवास, बढ़भागी वह वंश है।।

वहाँ सभी का मान, जिस घर में रहते बड़े।
रखते प्रभु जी ध्यान, बड़भागी उस वंश का।।
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पहचान
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हो निज की पहचान, सभी लोग हैं चाहते।
इसका कर्म विधान, मगर समझते हैं नहीं।।

कहते हैं यमराज, हमें आप पहचान लो।
गिरता सबका ताज, जिसके आगे एक दिन।।

उसकी निज पहचान, हर प्राणी को दंभ है।
व्यर्थ संग में ज्ञान, निकले तन से प्राण ज्यों।।
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आजादी
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आजादी की आस, सींचा अपने खून से।
लड़े आखिरी साँस, और हुए बलिदान पर।।

मन में जगे उजास, आजादी के गीत गा।
पूरा हो विश्वास, गगन तिरंगा कह रहा।।

आजादी के साथ, टूट गई सब बेड़ियाँ।
लक्ष्य हमारे हाथ, सपने जो रणबाँकुरे।।

आजादी का मान, हर भारतवासी रखे।
होगा गौरव गान, तभी हमारे राष्ट्र का।।
*******
सुधीर श्रीवास्तव

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कुण्डलिनी छंद 
*********
आई  है  जब आपदा, भरते  हैं सब  आह।
मानें   ईश्वर   दंड  है, बस्ती   हुई   तबाह।।
बस्ती हुई तबाह, आज तो  हम सब  डरते।
पाप घड़े में पुण्य, सभी  मिलकर हैं भरते।।१३७

धीरज  लालीपाप  है, कहते  हैं  अब  लोग।
जिसके हिस्से आ गया, कल ही भारी रोग।।
कल ही भारी रोग, कहेंगे  क्या अब  नीरज।
कहते हैं यमराज, भला क्यों रखना धीरज।।१३८

दुर्घटना  के  बाद  तो,    होते   सारे  खेल।
सूत्र जोड़ते फिर रहे, निकल रहा है तेल।।
निकल रहा है तेल, व्यर्थ लगता है खटना।
कहें मित्र यमराज, नहीं हो अब  दुर्घटना।।१३९

कहना  कितना  है  सही,  मिले  कहाँ  आराम।
इसका  मतलब  है यही, करते क्या हो  काम।।
कब  करते  हो काम,    बनाया  इसको  गहना।
कहें  मित्र  यमराज,  बात सब सच ही कहना।।१४०

मानव   नाहक   बन   रहा,     जानबूझ   अंजान।
शीश झुका स्वीकारिए, विधि का अजब विधान।।
विधि का अजब विधान, नहीं तुम  बनना  दानव।
होगा  तब  कल्याण, आप बन रहना बस मानव।।१४१

खिंचती  कुर्सी  लोभ में, नफरत की दीवार।
आपस में ही  फैलती, नित नूतन  तकरार।।
नित नूतन तकरार, व्यर्थ ही  जनता लड़ती।
बात-बात पर आज, नई तलवारें  खिंचती।।१४२

दिखता क्यों हमको नहीं, बिछा मौत का जाल। 
या  फिर  होती  है  खुशी, आ  जाता  है  काल।
बन  जाता  है  काल,    हमें  तो  खाना  पिस्ता।
किसका रखना ध्यान, नहीं जब कोई  दिखता।।१४३

ऐसी करनी कीजिए, लोग करें  गुणगान।
संग आपसे दूर हो, कैसा भी अभिमान।।
कैसा भी अभिमान, भावना दूजा  कैसी।
करना नहीं विचार, संत की वाणी ऐसी।।१४४

नजराना  जो  पा  रहे,   उस  पर  करो  विचार।
आखिर इसका राज क्या, या फिर चढ़े उधार।।
या  फिर  चढ़े  उधार, आज  का  देख  जमाना।
कल को पड़े न भार, आज मिलता  नजराना।।१४५

झूठा नहीं  जताइए, प्रिय  मित्र  तुम खेद।
छोटी सी तो बात है, करिए कभी न भेद।।
करिए कभी  न भेद, भले हो  कोई  रूठा।
समझो इतनी बात, खेल करना मत झूठा।।१४६
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जन्माष्टमी 
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कहना है श्री कृष्ण से, दें  थोड़ा अब  ध्यान।  
एक बार फिर जगत को, दें गीता का ज्ञान।।     
दें गीता  का ज्ञान, हमें  अब  आया  ठगना।                 
मानें  मेरी  बात,    प्रेम  से  इतना  कहना।।१४७       

माखन चोर का जन्मदिन,मना रहे हम आज।
इससे  सुंदर  कुछ  नहीं, दूजा  कोई  काज।।
दूजा   कोई  काज, कर्म भी जब  मनभावन।
तब होंगे श्री कृष्ण, आप घर खाकर माखन।।१४८

लाला नंद के  चाहते, रहो  खुशी  से  आप।
मगर कर्म ऐसा करो, जिसको कहते पाप।।
जिसको कहते पाप, बड़ा है  गड़बड़झाला।
उलझन में हैं आज, कृष्ण कन्हैया लाला।।१४९
   
जाना ही जब आपको, आते क्यों हो आप।
नहीं देखना है अगर, जब धरती का पाप।। 
जब धरती का पाप, सिर्फ है माखन खाना।
कहें मित्र यमराज, कृष्ण मत आकर जाना।।१५०

घर की रौनक  बेटियाँ, आँगन  की  मुस्कान।
मात-पिता के हृदय का, नभ जैसा अरमान।।
नभ  जैसा अरमान, आज  अब डर है  भारी।
तेजी से है बढ़ रही, लगे  कैंसर सी  बीमारी।।१५१

सुधीर श्रीवास्तव

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कुण्डलिया छंद
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देना किसको दोष है, पहले जाओ भूल।
पहले इसको झेल लो, चुभा हुआ जो शूल।।
चुभा हुआ जो शूल, बैठ मत माथा पीटो।
बस्ती हुई तबाह, लगाओ पावर वीटो।।
कहें मित्र यमराज, भूल खाना मत छेना।
दिया प्रकृति ने खूब, आज अब हमको देना।।२४३

होना ऐसा चाहिए, विकसित कोई तंत्र।
दुर्घटना हो ही नहीं, लिखा जाय अब मंत्र।।
लिखा जाय अब मंत्र, रहे हर प्राण सुरक्षित।
या फिर संत-महंत, करें जगती को दीक्षित।।
दुर्घटना के बाद, पड़े क्यों हमको रोना।
मिलकर करो उपाय, चाहते सबका होना।।२४४

सबका निज मंतव्य है, फिर कैसी तकरार।
लोकतंत्र ने है दिया, सबको यह अधिकार।।
सबको यह अधिकार, समझिए जिम्मेदारी।
व्यर्थ ठानना रार, पड़ेगी सब पर भारी।।
मगर कहीं पर मित्र, एक ऐसा है तबका।
जिस पर है दायित्व, हमेशा से ही सबका।।२४५

जीवन में किसको भला, मिले कहाँ आराम।
चाहत रहती जब सदा, सब कुछ मिले हराम।।
सब कुछ मिले हराम, यही कलयुग है भैया।
सब झूठी है बात, हाय मत कर तू दैया।।
कहें मित्र यमराज, नहीं होता सब नीमन।
सत्य हमारी बात, चले अब ऐसे जीवन।।२४६

राधा नाम है मोक्ष का, राधा प्रेम स्वरूप।
राधा बिन फीका लगे, माधव का भी रूप॥
माधव का भी रुप, संग जब राधा है का।
दिखता अद्भुत रुप, हमें मन वृंदावन का।
मान रहा संसार, दूर होगी सब बाधा।
रटते रहिए नाम, आप बस केवल राधा॥२४७

गुरुजन देते ज्ञान का, सबको ही भंडार।
कहाँ समझते हैं सभी, यह जीवन आधार।।
यह जीवन आधार, और उद्धार हमारा।
नमन करूँ सौ बार, बोध है इतना सारा।।
यही सत्य है बात, सोचिए सब अपने मन।
मत करिए अपमान, कहें जिनको भी गुरुजन।।२४८

दुनिया का दस्तूर है, बने रहो अंजान।
हम क्यों मानें तब भला, बँटता है जो ज्ञान।।
बँटता है जो ज्ञान, भाव कितना है इसका।
विधि का अजब विधान, सत्य कहना है किसका।
कहें मित्र यमराज, बात सुन मेरी मुनिया।
जैसे चलती आज, चलेगी वैसे दुनिया।।२४९

आपस में अब हम सभी, खींचें नई लकीर।
बनना अब हमको नहीं, पैदायशी फकीर।।
पैदायशी फकीर, समझ की बड़ी जरूरत।
खिंचती जो दीवार, मिटाओ बढ़ती नफरत।।
कहें मित्र यमराज, चाल जो चलता काकस।
नफ़रत की दीवार, गिराकर मिलिए आपस।।२५०

चाहे जितना हम सभी, करते रहें उपाय।
खुद ही हम खुद के लिए, बनते कहाँ सहाय।।
बनते कहाँ सहाय, दोष औरों का देते।
बड़े मजे में आप, नाव अपनी हैं खेते।।
कहें मित्र यमराज, लोग सब हमें सराहें।
करना क्यों तकरार, यही हम केवल चाहें।।२५१

संरक्षण को आजकल, मिले नहीं अब भाव।
सहना पड़ता व्यर्थ में, मिलता है जो घाव।।
मिलता है जो घाव, जमाना ऐसा आया।
लगता है अब आज, व्यर्थ है मानव काया।।
कहें मित्र यमराज, मृत्यु का ओढ़ आवरण।
फिर करिएगा आप, किसी का भी संरक्षण।।२५२

आया कैसा दौर में, लोग रहे हैं भोग।
पक्षपात के फेर में, बढ़ता जाता रोग।।
बढ़ता जाता रोग, आप हम सब हैं ज्ञानी।
फिर भी रोते आप, याद आती क्यों नानी।।
कहें मित्र यमराज, स्वार्थ की देखो माया।
बनने रिश्तेदार, निकट हम सबके आया।।२५३

ज्ञानी तो इस दौर में, वे ही सारे लोग।
औरों को जो बाँटते, बड़े प्रेम से रोग।।
बड़े प्रेम से रोग, चाल अपनी जो चलते।
वही आपको आज, सभी में अच्छे लगते।।
पक्षपात आरोप, लगाते रहिए जानी।
खुश होते हैं खूब, लोग कहते जब ज्ञानी।।२५४

हिंदी दिवस मनाइए, कौन रहा है रोक।
पर इतना भी जानिए, हमें तनिक है शोक।।
हमें तनिक है शोक, राजभाषा ये अब तक।
व्यर्थ सुने क्या गान, राष्ट्र की भाषा जब तक।।
कहें मित्र यमराज, नहीं दिखलाओ बिंदी।
करो आप तब बात, राष्ट्र भाषा जब हिंदी।।२५५
अवगुण यह भी एक है, इतना हमको ज्ञान।
मगर व्यर्थ की बात का, हम देते कब ध्यान।।
हम देते कब ध्यान, मूर्ख हमको क्या समझे।
जो आकर बेकार, यहाँ हम खुद ही उलझे।।
कहें मित्र यमराज, समझिए मेरे भाया।
क्यों देते हो दोष, भ्रमण बसुधा यह आया।।२५६

चाहो यदि कल्याण तो, आओ मम दरबार।
नहीं पता क्या आपको, है अपनी सरकार।।
है अपनी सरकार, यमराज बैठे हैं कुर्सी।
नीति नियम सिद्धांत, कीजिए मातम पुर्सी।।
कहें मित्र यमराज, आप धन खूब उगाहो।
सोच समझ कर आप, भला तुम जिसका चाहो।।२५७

करते जो व्यायाम नित, रहें स्वस्थ सानंद।
मन में भरे उमंग वो, पाते सुखदानंद।।
पाते सुखदा नंद, सफलता पास बुलाते।
रोग रहे हैरान, भागकर कोसों जाते।।
कहें मित्र यमराज, आप जीवन भर हँसते।
उठकर प्रातःकाल, नित व्यायाम जो करते।।२५८

आँसू पीकर क्यों भला, आप चलाते काम।
जान-बूझकर हो रहे, नाहक ही बदनाम।।
नाहक ही बदनाम, चाहता आज जमाना।
दूजा खींचो टाँग, लाभ बस खूब उठाना।
कहें मित्र यमराज, आप अब बनिए बासू।
पहले मानो बात, छोड़कर पीना आँसू।।२५९

कितना देता कौन है, अब आँसू को भाव।
सब देना हैं चाहते, बस उपहारी घाव।।
बस उपहारी घाव, नहीं जो आप देखते।
रिसता भीतर घाव , जिसे सब कहाँ समझते।।
कहें मित्र यमराज, स्वार्थ सबका है जितना।
फिर भी पूछें आप, मानना किसको कितना।।२६०

ऐसी करनी कीजिए, दुनिया देखे रंग।
नाहक चिंता आपकी, पड़े रंग में भंग।।
पड़े रंग में भंग, यही है आज जमाना।
करो कमाई और, किसी को नहीं बताना।।
कहें मित्र यमराज, कीजिए वैसी तैसी।
मज़ा कीजिए आप, आज की दुनिया ऐसी।।२६१

जिसको अपना कह रहे, वही दे रहा दाँव।
गाँवों में भी अब कहाँ, पहले जैसी छाँव।।
पहले जैसी छाँव, व्यर्थ बनना है कच्चा।
मिले न सच्चा मीत, बड़े मूरख हो बच्चा।।
कहें मित्र यमराज, समझना इसको उसको।
धोखा देगा रोज, कहो तुम अपना जिसको।।२६२

अब-तक कोई है नहीं, अपने शीश उधार।
निकल चलें हम आप तो, छोड़-छाड़ भंगार।।
छोड़ -छाड़ भंगार, नहीं अब अपना कोई।
चलो चलें उस पार, व्यर्थ है किस्सागोई।।
कहें मित्र यमराज, रहें आगे भी लक-दक।
बचा रहे सम्मान, आज तक जैसे अब-तक।।३६३

गौरा माँ के लाल को, सुमिरो बारम्बार।
विघ्न हरण मंगल करण, होती जय जयकार।।
होती जय जयकार, करो गणपति की पूजा।
रिद्धि-सिद्धि के नाथ, नहीं कोई जग दूजा।।
कहें मित्र यमराज, पड़ा क्या तुमको दौरा।
कृपा सिंधु दातार, हमारी माँ हैं गौरा।।२६४

गौरा माँ के लाल हैं, लम्बोदर गणराज।
मोदक प्रिय सरकार हैं, करते सबके काज।।
साजें सबके काज, प्रथम पूजित कहलाते।
जो भी सुमिरे आप, विघ्न उसके कट जाते।।
कहें मित्र यमराज, चरण इनके सुखकौरा।
देवों के सिरमौर, प्राण प्यारे शिव गौरा।।२६५

मोदी जी लगने लगे, जैसे हों अवधूत।
बेबस आज विपक्ष है, कहते मोदी भूत।।
कहते मोदी भूत, धरा ये मानव आया।
देवदूत बन आज, विश्व में नाम कमाया।।
कहें मित्र यमराज, लोग कुछ खोजें गोदी।
मिले नहीं अब ठौर, पड़ा पीछे है मोदी।।२६६

आशा कभी न छोड़िए, सीधी सी है बात।
वरना खाते रहोगे, प्रिय मित्र तुम लात।।
प्रिय मित्र तुम लात, व्यर्थ है आप उदासी।
अच्छा होगा छोड़िए, निराशा सारी बासी।।
कहें मित्र यमराज, हौसला रखो अकाशा।
जग को लोगे जीत, कभी मत छोड़ो आशा।।२६७

नीमकरोली नाम की, महिमा अपरम्पार।
कैंची धाम में बैठके, करते भव से पार।।
करते भव से पार, राम की धुन भी गाते।
आते भक्त जो द्वार, कृपा हनुमत की पाते।।
कहें मित्र यमराज, आप मुख निकले बोली।
मिट जाते सब कष्ट, कहें सब नीमकरोली।।२६८

मानव तो हम आप हैं, फिर भी होता खेद।
ऊँच-नीच के नाम पर, करते रहते भेद।
करते रहते भेद, सोचिए क्या है अच्छा।
नहीं आप भगवान, रहे ले आप परीक्षा।।
कहें मित्र यमराज, नहीं बनना है दानव।
करिए कभी न भेद, भाग्य से जन्मे मानव।।२६९

स्पंदन मरता है भले, झूठे लगते साथ।
मन में पावनता बसी, प्रभु जी थामें हाथ।।
प्रभु जी थामें हाथ, प्रफुल्लित मानस होता।
जलती जीवन ज्योति, फूटता मोहक सोता।।
कहें मित्र यमराज, यही है सच्चा वंदन।
नहीं और की चाह, कृपा प्रभु जी का स्पंदन।।२७०

करते सारे काम सब, सुविधा के अनुसार।
फिर क्यों करते लोग हैं, नाहक ही तकरार।।
नाहक ही तकरार, संग में गाओ गाना।
झूठा है ये प्यार, व्यर्थ बाँसुरी बजाना।।
कहें मित्र यमराज, रहो ऐसे ही चलते।
और नहीं कुछ काम, आप जो इतना करते।।२७१

घर की रौनक बेटियाँ, आँगन की मुस्कान।
मात-पिता के हृदय का, नभ जैसा अरमान।।
नभ जैसा अरमान, आज अब डर है भारी।
तेजी से है बढ़ रही, लगे कैंसर सी बीमारी।।
चिंतित आज समाज, परीक्षा जैसे सबकी।
यही कहानी आज, सभी के अपने घर की।।२७२

मंदिर में होता सदा, भक्ति भाव संवाद।
और संग में गूँजता, घंटा शंख निनाद।।
घंटा शंख निनाद, भावना पावन होती।
ले आती फरियाद, बिलखती वह है रोती।।
कहें मित्र यमराज, मानते जिनको फिर-फिर।
उनके दर पर शीश, झुकाने जाते मंदिर।।२७३

मूरत पूजन भाव से, रखते मन में आस।
आज विसर्जन की घड़ी, आँखें हुईं उदास।।
आँखें हुईं उदास, विदा होते गणराजा।
आना अगले साल, विनय सब करे समाजा।।
कहें मित्र यमराज, यही जगत का सूरत।
भक्तों के मन आप, अमर रहती है मूरत ।।२७४

करने जाते हैं सभी, मन से विदा गणेश।
नैन भरे जलधार हैं, दूर सभी आवेश।।
दूर सभी आवेश, भक्त कहते फिर आना।
अगले बरस तू शीघ्र, लौटकर फिर आ जाना।।
कहें मित्र यमराज, चले हैं झोली भरने।
नाम विसर्जन आज, तिरोहित गणपति करने।।२७५

मानव तो हम आप हैं, फिर भी होता खेद।
ऊँच-नीच के नाम पर, करते रहते भेद।
करते रहते भेद, सोचिए क्या है अच्छा।
नहीं आप भगवान, रहे ले आप परीक्षा।।
कहें मित्र यमराज, नहीं बनना है दानव।
करिए कभी न भेद, भाग्य से जन्मे मानव।।२७६

इतनी सी करिए कृपा, संकट हरो गणेश।
छोटा सा अनुरोध है, मानो श्री विघ्नेश।।
मानो श्री विघ्नेश, खूब मोदक तब खाओ।
व्यर्थ छोड़ तकरार, आप निर्धन घर आओ।।
कहें मित्र यमराज, बात न चुपड़ी चिकनी।
करो जगत कल्याण, बात मेरी बस इतनी।।२७७
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नवरात्रि
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माता के दरबार में, लगती भारी भीड़।
लगता सबका अब यहीँ, होगा प्यारा नीड़।।
होगा प्यारा नीड़, भेद बस मैय्या जानें।
होते हम हैं कौन, बात मेरी जो मानें।।
कहें मित्र यमराज, गाड़कर अपना छाता।
करना है जो आप, करो अब जग की माता।।२७८

होगा पूजा पाठ फिर, आदि शक्ति के नाम।
इसके पीछे मानिए, सबका स्वारथ आम।।
सबका स्वारथ आम, मातु को हम भरमाएँ।
अपना मानव धर्म, दिवस नौ खूब निभाएँ।।
कहें मित्र यमराज, मातु मम हर लो रोगा।
हमें नहीं है ज्ञान, हमारा कल क्या होगा।।२७९
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सतगुरु
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अपना कोई है नहीं, आप लीजिए जान।
केवल सतगुरु आपका, यही आज का ज्ञान।।
यही आज का ज्ञान, शरण जा शीश झुकाओ।
हर दुविधा से दूर, मार्ग जीवन का पाओ।।
कहें मित्र यमराज, नहीं तुमको है डरना।
सतगुरु की जब छाँव, मस्त जीवन हो अपना।।२८०

अपने पर विश्वास का, सीख लीजिए मंत्र।
सतगुरु देंगे आपको, सुखदा जीवन यंत्र।।
सुखदा जीवन यंत्र, दूर कुविचार करेगा।
गुरु कृपा से आप, सकल अँधियार मिटेगा।।
कहें मित्र यमराज, देखिए सुंदर सपने।
श्रद्धा अरु विश्वास, लगें तब सतगुरु अपने।।२८१

वंदन सद्गुरु कीजिए, हर दिन आठों याम।
मातु-पिता की वंदना, लेकर प्रभु का नाम।।
लेकर प्रभु का नाम, नहीं है मुश्किल इतना।
समझ रहे हम आप, बोझ जो इसको जितना।।
कहें मित्र यमराज, आप बन जाओ नंदन।
मिले कृपा आशीष, मातु-पित सद्गुरु वंदन।।२८२

सुधीर श्रीवास्तव

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कुण्डलिया छंद
*********
देना किसको दोष है, पहले जाओ भूल।
पहले इसको झेल लो, चुभा हुआ जो शूल।।
चुभा हुआ जो शूल, बैठ मत माथा पीटो।
बस्ती हुई तबाह, लगाओ पावर वीटो।।
कहें मित्र यमराज, भूल खाना मत छेना।
दिया प्रकृति ने खूब, आज अब हमको देना।।२४३

होना ऐसा चाहिए, विकसित कोई तंत्र।
दुर्घटना हो ही नहीं, लिखा जाय अब मंत्र।।
लिखा जाय अब मंत्र, रहे हर प्राण सुरक्षित।
या फिर संत-महंत, करें जगती को दीक्षित।।
दुर्घटना के बाद, पड़े क्यों हमको रोना।
मिलकर करो उपाय, चाहते सबका होना।।२४४

सबका निज मंतव्य है, फिर कैसी तकरार।
लोकतंत्र ने है दिया, सबको यह अधिकार।।
सबको यह अधिकार, समझिए जिम्मेदारी।
व्यर्थ ठानना रार, पड़ेगी सब पर भारी।।
मगर कहीं पर मित्र, एक ऐसा है तबका।
जिस पर है दायित्व, हमेशा से ही सबका।।२४५

जीवन में किसको भला, मिले कहाँ आराम।
चाहत रहती जब सदा, सब कुछ मिले हराम।।
सब कुछ मिले हराम, यही कलयुग है भैया।
सब झूठी है बात, हाय मत कर तू दैया।।
कहें मित्र यमराज, नहीं होता सब नीमन।
सत्य हमारी बात, चले अब ऐसे जीवन।।२४६

राधा नाम है मोक्ष का, राधा प्रेम स्वरूप।
राधा बिन फीका लगे, माधव का भी रूप॥
माधव का भी रुप, संग जब राधा है का।
दिखता अद्भुत रुप, हमें मन वृंदावन का।
मान रहा संसार, दूर होगी सब बाधा।
रटते रहिए नाम, आप बस केवल राधा॥२४७

गुरुजन देते ज्ञान का, सबको ही भंडार।
कहाँ समझते हैं सभी, यह जीवन आधार।।
यह जीवन आधार, और उद्धार हमारा।
नमन करूँ सौ बार, बोध है इतना सारा।।
यही सत्य है बात, सोचिए सब अपने मन।
मत करिए अपमान, कहें जिनको भी गुरुजन।।२४८

दुनिया का दस्तूर है, बने रहो अंजान।
हम क्यों मानें तब भला, बँटता है जो ज्ञान।।
बँटता है जो ज्ञान, भाव कितना है इसका।
विधि का अजब विधान, सत्य कहना है किसका।
कहें मित्र यमराज, बात सुन मेरी मुनिया।
जैसे चलती आज, चलेगी वैसे दुनिया।।२४९

आपस में अब हम सभी, खींचें नई लकीर।
बनना अब हमको नहीं, पैदायशी फकीर।।
पैदायशी फकीर, समझ की बड़ी जरूरत।
खिंचती जो दीवार, मिटाओ बढ़ती नफरत।।
कहें मित्र यमराज, चाल जो चलता काकस।
नफ़रत की दीवार, गिराकर मिलिए आपस।।२५०

चाहे जितना हम सभी, करते रहें उपाय।
खुद ही हम खुद के लिए, बनते कहाँ सहाय।।
बनते कहाँ सहाय, दोष औरों का देते।
बड़े मजे में आप, नाव अपनी हैं खेते।।
कहें मित्र यमराज, लोग सब हमें सराहें।
करना क्यों तकरार, यही हम केवल चाहें।।२५१

संरक्षण को आजकल, मिले नहीं अब भाव।
सहना पड़ता व्यर्थ में, मिलता है जो घाव।।
मिलता है जो घाव, जमाना ऐसा आया।
लगता है अब आज, व्यर्थ है मानव काया।।
कहें मित्र यमराज, मृत्यु का ओढ़ आवरण।
फिर करिएगा आप, किसी का भी संरक्षण।।२५२

आया कैसा दौर में, लोग रहे हैं भोग।
पक्षपात के फेर में, बढ़ता जाता रोग।।
बढ़ता जाता रोग, आप हम सब हैं ज्ञानी।
फिर भी रोते आप, याद आती क्यों नानी।।
कहें मित्र यमराज, स्वार्थ की देखो माया।
बनने रिश्तेदार, निकट हम सबके आया।।२५३

ज्ञानी तो इस दौर में, वे ही सारे लोग।
औरों को जो बाँटते, बड़े प्रेम से रोग।।
बड़े प्रेम से रोग, चाल अपनी जो चलते।
वही आपको आज, सभी में अच्छे लगते।।
पक्षपात आरोप, लगाते रहिए जानी।
खुश होते हैं खूब, लोग कहते जब ज्ञानी।।२५४

हिंदी दिवस मनाइए, कौन रहा है रोक।
पर इतना भी जानिए, हमें तनिक है शोक।।
हमें तनिक है शोक, राजभाषा ये अब तक।
व्यर्थ सुने क्या गान, राष्ट्र की भाषा जब तक।।
कहें मित्र यमराज, नहीं दिखलाओ बिंदी।
करो आप तब बात, राष्ट्र भाषा जब हिंदी।।२५५
अवगुण यह भी एक है, इतना हमको ज्ञान।
मगर व्यर्थ की बात का, हम देते कब ध्यान।।
हम देते कब ध्यान, मूर्ख हमको क्या समझे।
जो आकर बेकार, यहाँ हम खुद ही उलझे।।
कहें मित्र यमराज, समझिए मेरे भाया।
क्यों देते हो दोष, भ्रमण बसुधा यह आया।।२५६

चाहो यदि कल्याण तो, आओ मम दरबार।
नहीं पता क्या आपको, है अपनी सरकार।।
है अपनी सरकार, यमराज बैठे हैं कुर्सी।
नीति नियम सिद्धांत, कीजिए मातम पुर्सी।।
कहें मित्र यमराज, आप धन खूब उगाहो।
सोच समझ कर आप, भला तुम जिसका चाहो।।२५७

करते जो व्यायाम नित, रहें स्वस्थ सानंद।
मन में भरे उमंग वो, पाते सुखदानंद।।
पाते सुखदा नंद, सफलता पास बुलाते।
रोग रहे हैरान, भागकर कोसों जाते।।
कहें मित्र यमराज, आप जीवन भर हँसते।
उठकर प्रातःकाल, नित व्यायाम जो करते।।२५८

आँसू पीकर क्यों भला, आप चलाते काम।
जान-बूझकर हो रहे, नाहक ही बदनाम।।
नाहक ही बदनाम, चाहता आज जमाना।
दूजा खींचो टाँग, लाभ बस खूब उठाना।
कहें मित्र यमराज, आप अब बनिए बासू।
पहले मानो बात, छोड़कर पीना आँसू।।२५९

कितना देता कौन है, अब आँसू को भाव।
सब देना हैं चाहते, बस उपहारी घाव।।
बस उपहारी घाव, नहीं जो आप देखते।
रिसता भीतर घाव , जिसे सब कहाँ समझते।।
कहें मित्र यमराज, स्वार्थ सबका है जितना।
फिर भी पूछें आप, मानना किसको कितना।।२६०

ऐसी करनी कीजिए, दुनिया देखे रंग।
नाहक चिंता आपकी, पड़े रंग में भंग।।
पड़े रंग में भंग, यही है आज जमाना।
करो कमाई और, किसी को नहीं बताना।।
कहें मित्र यमराज, कीजिए वैसी तैसी।
मज़ा कीजिए आप, आज की दुनिया ऐसी।।२६१

जिसको अपना कह रहे, वही दे रहा दाँव।
गाँवों में भी अब कहाँ, पहले जैसी छाँव।।
पहले जैसी छाँव, व्यर्थ बनना है कच्चा।
मिले न सच्चा मीत, बड़े मूरख हो बच्चा।।
कहें मित्र यमराज, समझना इसको उसको।
धोखा देगा रोज, कहो तुम अपना जिसको।।२६२

अब-तक कोई है नहीं, अपने शीश उधार।
निकल चलें हम आप तो, छोड़-छाड़ भंगार।।
छोड़ -छाड़ भंगार, नहीं अब अपना कोई।
चलो चलें उस पार, व्यर्थ है किस्सागोई।।
कहें मित्र यमराज, रहें आगे भी लक-दक।
बचा रहे सम्मान, आज तक जैसे अब-तक।।३६३

गौरा माँ के लाल को, सुमिरो बारम्बार।
विघ्न हरण मंगल करण, होती जय जयकार।।
होती जय जयकार, करो गणपति की पूजा।
रिद्धि-सिद्धि के नाथ, नहीं कोई जग दूजा।।
कहें मित्र यमराज, पड़ा क्या तुमको दौरा।
कृपा सिंधु दातार, हमारी माँ हैं गौरा।।२६४

गौरा माँ के लाल हैं, लम्बोदर गणराज।
मोदक प्रिय सरकार हैं, करते सबके काज।।
साजें सबके काज, प्रथम पूजित कहलाते।
जो भी सुमिरे आप, विघ्न उसके कट जाते।।
कहें मित्र यमराज, चरण इनके सुखकौरा।
देवों के सिरमौर, प्राण प्यारे शिव गौरा।।२६५

मोदी जी लगने लगे, जैसे हों अवधूत।
बेबस आज विपक्ष है, कहते मोदी भूत।।
कहते मोदी भूत, धरा ये मानव आया।
देवदूत बन आज, विश्व में नाम कमाया।।
कहें मित्र यमराज, लोग कुछ खोजें गोदी।
मिले नहीं अब ठौर, पड़ा पीछे है मोदी।।२६६

आशा कभी न छोड़िए, सीधी सी है बात।
वरना खाते रहोगे, प्रिय मित्र तुम लात।।
प्रिय मित्र तुम लात, व्यर्थ है आप उदासी।
अच्छा होगा छोड़िए, निराशा सारी बासी।।
कहें मित्र यमराज, हौसला रखो अकाशा।
जग को लोगे जीत, कभी मत छोड़ो आशा।।२६७

नीमकरोली नाम की, महिमा अपरम्पार।
कैंची धाम में बैठके, करते भव से पार।।
करते भव से पार, राम की धुन भी गाते।
आते भक्त जो द्वार, कृपा हनुमत की पाते।।
कहें मित्र यमराज, आप मुख निकले बोली।
मिट जाते सब कष्ट, कहें सब नीमकरोली।।२६८

मानव तो हम आप हैं, फिर भी होता खेद।
ऊँच-नीच के नाम पर, करते रहते भेद।
करते रहते भेद, सोचिए क्या है अच्छा।
नहीं आप भगवान, रहे ले आप परीक्षा।।
कहें मित्र यमराज, नहीं बनना है दानव।
करिए कभी न भेद, भाग्य से जन्मे मानव।।२६९

स्पंदन मरता है भले, झूठे लगते साथ।
मन में पावनता बसी, प्रभु जी थामें हाथ।।
प्रभु जी थामें हाथ, प्रफुल्लित मानस होता।
जलती जीवन ज्योति, फूटता मोहक सोता।।
कहें मित्र यमराज, यही है सच्चा वंदन।
नहीं और की चाह, कृपा प्रभु जी का स्पंदन।।२७०

करते सारे काम सब, सुविधा के अनुसार।
फिर क्यों करते लोग हैं, नाहक ही तकरार।।
नाहक ही तकरार, संग में गाओ गाना।
झूठा है ये प्यार, व्यर्थ बाँसुरी बजाना।।
कहें मित्र यमराज, रहो ऐसे ही चलते।
और नहीं कुछ काम, आप जो इतना करते।।२७१

घर की रौनक बेटियाँ, आँगन की मुस्कान।
मात-पिता के हृदय का, नभ जैसा अरमान।।
नभ जैसा अरमान, आज अब डर है भारी।
तेजी से है बढ़ रही, लगे कैंसर सी बीमारी।।
चिंतित आज समाज, परीक्षा जैसे सबकी।
यही कहानी आज, सभी के अपने घर की।।२७२

मंदिर में होता सदा, भक्ति भाव संवाद।
और संग में गूँजता, घंटा शंख निनाद।।
घंटा शंख निनाद, भावना पावन होती।
ले आती फरियाद, बिलखती वह है रोती।।
कहें मित्र यमराज, मानते जिनको फिर-फिर।
उनके दर पर शीश, झुकाने जाते मंदिर।।२७३

मूरत पूजन भाव से, रखते मन में आस।
आज विसर्जन की घड़ी, आँखें हुईं उदास।।
आँखें हुईं उदास, विदा होते गणराजा।
आना अगले साल, विनय सब करे समाजा।।
कहें मित्र यमराज, यही जगत का सूरत।
भक्तों के मन आप, अमर रहती है मूरत ।।२७४

करने जाते हैं सभी, मन से विदा गणेश।
नैन भरे जलधार हैं, दूर सभी आवेश।।
दूर सभी आवेश, भक्त कहते फिर आना।
अगले बरस तू शीघ्र, लौटकर फिर आ जाना।।
कहें मित्र यमराज, चले हैं झोली भरने।
नाम विसर्जन आज, तिरोहित गणपति करने।।२७५

मानव तो हम आप हैं, फिर भी होता खेद।
ऊँच-नीच के नाम पर, करते रहते भेद।
करते रहते भेद, सोचिए क्या है अच्छा।
नहीं आप भगवान, रहे ले आप परीक्षा।।
कहें मित्र यमराज, नहीं बनना है दानव।
करिए कभी न भेद, भाग्य से जन्मे मानव।।२७६

इतनी सी करिए कृपा, संकट हरो गणेश।
छोटा सा अनुरोध है, मानो श्री विघ्नेश।।
मानो श्री विघ्नेश, खूब मोदक तब खाओ।
व्यर्थ छोड़ तकरार, आप निर्धन घर आओ।।
कहें मित्र यमराज, बात न चुपड़ी चिकनी।
करो जगत कल्याण, बात मेरी बस इतनी।।२७७
********
नवरात्रि
********
माता के दरबार में, लगती भारी भीड़।
लगता सबका अब यहीँ, होगा प्यारा नीड़।।
होगा प्यारा नीड़, भेद बस मैय्या जानें।
होते हम हैं कौन, बात मेरी जो मानें।।
कहें मित्र यमराज, गाड़कर अपना छाता।
करना है जो आप, करो अब जग की माता।।२७८

होगा पूजा पाठ फिर, आदि शक्ति के नाम।
इसके पीछे मानिए, सबका स्वारथ आम।।
सबका स्वारथ आम, मातु को हम भरमाएँ।
अपना मानव धर्म, दिवस नौ खूब निभाएँ।।
कहें मित्र यमराज, मातु मम हर लो रोगा।
हमें नहीं है ज्ञान, हमारा कल क्या होगा।।२७९
********
सतगुरु
*********
अपना कोई है नहीं, आप लीजिए जान।
केवल सतगुरु आपका, यही आज का ज्ञान।।
यही आज का ज्ञान, शरण जा शीश झुकाओ।
हर दुविधा से दूर, मार्ग जीवन का पाओ।।
कहें मित्र यमराज, नहीं तुमको है डरना।
सतगुरु की जब छाँव, मस्त जीवन हो अपना।।२८०

अपने पर विश्वास का, सीख लीजिए मंत्र।
सतगुरु देंगे आपको, सुखदा जीवन यंत्र।।
सुखदा जीवन यंत्र, दूर कुविचार करेगा।
गुरु कृपा से आप, सकल अँधियार मिटेगा।।
कहें मित्र यमराज, देखिए सुंदर सपने।
श्रद्धा अरु विश्वास, लगें तब सतगुरु अपने।।२८१

वंदन सद्गुरु कीजिए, हर दिन आठों याम।
मातु-पिता की वंदना, लेकर प्रभु का नाम।।
लेकर प्रभु का नाम, नहीं है मुश्किल इतना।
समझ रहे हम आप, बोझ जो इसको जितना।।
कहें मित्र यमराज, आप बन जाओ नंदन।
मिले कृपा आशीष, मातु-पित सद्गुरु वंदन।।२८२

सुधीर श्रीवास्तव

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रोला छंद
*********
व्यर्थ निकलती आह, बंद अब नाटक करिए।
जैसा आपका कर्म, दंड भी वैसा सहिए।।
कहें मित्र यमराज, छोड़िए रोना-धोना।
बस्ती हुई तबाह, बीज फिर नूतन बोना।।२३०

भरते हैं सब आह, आपदा आई भारी।
बस्ती हुई तबाह, नहीं की थी तैयारी।।
नहीं की थी तैयारी, आज तो हम सब डरते।
पाप घड़े में पुण्य, सभी मिलकर हैं भरते।।२३१

पोषण करते ईश, भोज्य अनेक हैं देते।
सबको नूतन राह, भले हम सब ना चेतें।।
कहें मित्र यमराज, नहीं करना तुम शोषण।
ईश्वर पर विश्वास, सभी का होगा पोषण।।२३२

आज बड़ी उपलब्धि, दूर अब हुआ कुपोषण।
बात अलग है और, आज भी होता शोषण।।
कहें मित्र यमराज, दोष हम सबका भारी।
फिर भी देना दोष, मानसिक है बीमारी।।२३३

दुर्घटना के बाद, तंत्र सब जागृति होते।
मजबूरी है यार, चैन से कब वे सोते।।
कहें मित्र यमराज, रोज होती दुर्घटना।
बेचारों को रोज, रात-दिन पड़ता खटना।।२३४

मिले कहाँ आराम, बात कहते हो सच्ची।
जीवन में है आज, बहुत ही माथा-पच्ची।।
कहें मित्र यमराज, चलो बनने सन्यासी।
मिले बहुत आराम, काम बस आप उबासी।।२३५

भक्ति भाव हो प्रबल, व्यर्थ चिंता कब होती।
रखते प्रभु जी ध्यान, नहीं चाहें हम मोती।।
कहें मित्र यमराज, प्रार्थना सबकी सुनते।
रखते जो विश्वास, साथ उनके ही रहते।।२३६

शिक्षक सदा महान, ज्ञान देता है उत्तम।
उनका आशीर्वाद, शिष्य बनता सर्वोत्तम।।
कहें मित्र यमराज, चरण हमइनके पूजें।
देते राह प्रकाश, मानते अपने चूजे।।२३७

शिक्षक जीवन मित्र, जानते हम सब इतना।
पर इनको सम्मान, आज हम देते कितना।।
कहें मित्र यमराज, भूल करते हम भारी।
जिसका है परिणाम, लगे निज जीवन खारी।।२३८

दूँगा यही सलाह, आज मित्रों मैं सबको।
नमन करूँ सौ बार, सोचना होगा हमको।।
सोचना होगा हमको, विनय बस यही करूँगा।
आप करो विश्वास, फीस भी इसकी दूँगा।।२३९

विधि का अजब विधान, आप मानो मत मानो।
सबसे ऊपर आप, भले ही खुद को जानो।।
कहें मित्र यमराज, खेल दिखता नित उसका।
हम सब कहते रोज,अजब विधान है विधि का।।२४०

नफरत की दीवार, नित्य है खींची जाती।
कुछ लोगों का स्वार्थ, टूटती जाए थाती।
कहें मित्र यमराज, देखते जाओ प्यारे।
या फिर छीलो घास, रहो बनकर घसियारे।।२४१

भ्रम में चाहो आप, डूबकर खोजो सोना।
बस रहना तैयार, प्यार से कल तुम रोना।।
कहें मित्र यमराज, कौन रोकेगा तुमको।
फुर्सत किसको आज, काम है ढेरों सबको।।२४२

हिंदी बड़ी महान, सितंबर चौदह आया।
करती गौरव गान, हमें है खूब सुहाया।।
पुस्तक सज्जा साज, हिंद संस्कृति की काया।
बन अक्षर से शब्द, आप हमने अपनाया।।२४३

हिंदी गुणों की खान, जानते भारतवासी।
करो नहीं तकरार, बनो मत तुम वनवासी।।
कहें मित्र यमराज, देश की भाषा हिंदी।
चमक रहा है भाल, राष्ट्र गौरव बन बिंदी।।२४४

नहीं दीन दिव्यांग, भले उसकी लाचारी।
दे कब ईश्वर दोष, भले हर दिन है भारी।
कहें मित्र यमराज, हौसला भी तो रखता।
बिन माने दिव्यांग, स्वाद मीठा फल चखता।।२४५

ऐसी करनी कीजिए, लगे लोगों को सुंदर।
बन जाओगे आप, बिना कुछ कहे धुरंधर।।
कहें मित्र यमराज, जगत में होगी चर्चा।
क्या है इसका राज, खोज होगी तब पर्चा।।२४६

मिला न सच्चा मीत, प्रश्न क्या इतना भारी।
समझ रहे क्यों आप, भला इसको बीमारी।।
कहें मित्र यमराज, व्यर्थ है भावुक होना।
रहो आप तैयार, चाहते कल यदि रोना।।२४७

संकट हरो गणेश, कहूँ मैं केवल इतना।
चाह रहे सब एक, नहीं कोई दुर्घटना।।
कहें मित्र यमराज, नाथ नखरे अब छोड़ो।
हर प्राणी की राह, सुखद चौराहा जोड़ो।।२४८

नमक-मिर्च का स्वाद , नहीं जिसने है जाना।
गाते भौंड़ा राग, भला इसको क्या खाना।।
कहें मित्र यमराज, करोगे तब तुम यारी।
इसके सेवन संग, दूर होगी बीमारी।।२४९

ध्यान दीजिए आप, प्रकृति का जो संदेशा।
वरना इक-दिन सत्य, बनेगा रेशा-रेशा।।
कहें मित्र यमराज, आप नादान न बनिए।
जीवन हो खुशहाल, प्यार हरियाली चुनिए।।२५०

धोखा देना काम, आज है बहुत जरूरी।
जिसके पास दिमाग, समझते हैं मजबूरी।।
चलें समय के साथ, आप मूरख मत बनिए।
यही गुरू का ज्ञान, देखकर नीचे चलिए।।२५१

क्यों करता तकरार, भला हमको बतलाओ।
ठाने रहते रार, तनिक ये भी समझाओ।।
कहें मित्र यमराज, राज क्या कैसे इसका।
होता किसका लाभ, नाम बतलाओ उसका।।२५२

खड़ा अकेला पूत, खेत में बना बिजूका।
गायब धड़ से शीश, लगे जैसे हो चूका।।
कहें मित्र यमराज, धैर्य से बैठी चिड़िया।
उसे कहाँ है बोध, नहीं है उसकी पिड़िया।।२५३

तुलसी दल उपयोग, सदा पूजन में होता।
पावनता परिवेश, लगाता सुंदर गोता।।
कहें मित्र यमराज, निराली इसकी माया।
हो जाता कल्याण, कृपा तुलसी जो पाया।।२५४

जिसका हमको खेद, हमें क्यों ऐसा करना।
करिए कभी न भेद, नहीं नाहक में डरना।।
कहें मित्र यमराज, नहीं रचना तुम माया।
स्वार्थ लोभ का खेल, भयानक दुख का साया।।२५५

संगम अपना स्वार्थ, नहीं हम मूरख भाई।
गाते रहिए आप, भले जो आप सुहाई।।
कहें मित्र यमराज, मूर्ख बनकर तुम घूमो।
अपनी है सरकार,जिसे चाहो जब चूमो।।२५६

जीवन का अनुवाद, प्रेम से जो कर लेता।
उसको होता बोध, भाव उत्तम भर देता।।
सद्गुरु देते ज्ञान, आप ही होता नीमन।
रहे सदा खुशहाल, सभी का अपना जीवन।।२५७

सुधीर श्रीवास्तव

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मुक्तक
*******
दोहा मुक्तक
**********
रोजी-रोटी के लिए, भटक रहे हैं लोग।
कुछ की खातिर है यही, सबसे भारी रोग।
कुछ का अच्छा भाग्य है, कुछ का है दुर्भाग्य-
ईश्वर की इच्छा प्रबल, या फिर है संयोग।।

रोजी-रोटी के लिए, छोड़ रहे घर-बार।
यह कैसी बेचारगी, बेबस है परिवार।
जीवन यापन के लिए, सहना पड़ता दंश-
व्यर्थ तनावों का भला, आप बताओ सार।।

शिक्षक का सम्मान अब, कितना होता आज।
नित-नित छीना जा रहा, उनका गौरव ताज।
कहें मित्र यमराज जी, आया कैसा दौर -
सोच रहे बस रात-दिन, बची रहे मम लाज।।

शिक्षक तो हैं हम सभी, मगर नहीं है ज्ञान।
इसीलिए बन घूमते, गाते झूठा गान।
कभी नहीं हैं चेतते, प्रश्न बड़ा गंभीर -
नित उड़ते उपहास को, मान रहे वरदान।।

कलियुग के कौरव सभी, उछल रहे हैं आज।
हम सब भी हैं जानते, क्या है इसका राज।
सारी दुनिया चाहती, आएँ अब श्री कृष्ण -
केवल उनके हाथ में, गिरा सकें जो ताज।।

क्षणिक सफलता से नहीं, मंत्रमुग्ध हों आप।
जारी रहिए कर्म का, आप निरंतर जाप।
भले लोग कुछ भी कहें, मत देना तुम ध्यान-
तब जीवन खुशहाल हो, बिना किसी अभिशाप।।

आज अमावस की निशा, सूना है आकाश।
हृदय दीप जलाइए, होगा नवल प्रकाश।
मिट जाए सारा तिमिर, नहीं छोड़ना धैर्य-
इंतजार बस कीजिए, नूतन प्रात उजास।।

चंदा रूठा गगन में, तारे हुए मलीन।
आई रात अमावसी, रंग रुप से हीन।
एक दिया है लड़ रहा, सारे तय से आज-
मन में रख विश्वास तू, बनते क्यों है दीन।।

धन जोड़ा छल कपट से, समझा सुख का लोक।
जाना खाली हाथ हैं, बिगड़ेगा परलोक।
माया के आधीन हो, करता है क्यों दंभ-
ज्ञान चक्षु को खोल रख, दूर रहे तब शोक।।

आज हकीकत से सभी, लेते हैं मुँह मोड़।
जान-बूझकर ढ़ूँढ़ते, इसका कोई तोड़।
डरते कब हैं लोग अब, रचने में षड्यंत्र -
केवल इतना चाहते, हो बस अपना जोड़।।

आने वाले समय में, ज्ञदेगा कष्ट तुषार।
नियम प्रकृति का है यही, समझो जीवन सार।
रहना पड़ेगा मित्रवर, सबको अपना ध्यान -
मुश्किल होगा तब बड़ी, व्यर्थ किया तकरार।।

संंतो का संगम जहाँ, वहाँ करो मत खेल।
कोशिश जितनी आपकी, सब होनी है फेल।।
कहें मित्र यमराज जी, छोड़ो व्यर्थ गुमान -
वरना जाकर बेंचिए, घूम-घूमकर तेल।।

आते तो हर वर्ष हैं, श्रीगणेश भगवान।
मगर नहीं हम जानते, जो है इसका ज्ञान।।
दुर्गति करते खूब हैं, जो दस दिन के बाद-
इसीलिए क्या हम सभी, करते बड़ा गुमान।।

वंदन श्री गणेश को, शीश झुकाते नित्य।
पूरे उसके काज सब, बिना किसी औचित्य।
विघ्न हरण दे ध्यान तब, रिद्धि सिद्धि के संग-
प्रथम पूज्य गणपति जी, बनते हैं आदित्य।।

गाँवों में भी आजकल, होते नित्य विवाद।
बीते दिन की अब भला, आती किसको याद।
शहरों में जो विष पले, गाँवों तक विस्तार-
सुनता किसकी कौन है, दाना पानी खाद।।

अपवादों को छोड़िए, प्यारा लगता गाँव।
रहते हैं सब प्रेम से, चाहे जितना घाँव।
सुख-दुख मिलकर बाँटते, भूल सभी मतभेद -
जिंदा अब भी गाँव में, दिखता है सद्भाव।।

पीपल बिन चौपाल अब, गाँव संग वीरान।
काट रहे सब मौन हो, किसको अब है ध्यान।
जिसके पत्तों पर लिखा, था अनुभव का मंत्र-
जड़ गहरी शाखें बड़ी, जस बुजुर्ग का ज्ञान।।

करना क्यों विश्वास ही, जब धोखों का दंश।
वैसे मिलता है सदा, सबको अपना अंश।
जब इतना सब है पता, फिर किसका है दोष-
यही हमारे आपके, जीवन का अपभ्रंश।।

संगत का होता असर, जान रहे हैं लोग।
फिर भी जाने क्यों भला, ले लेते अभियोग।
इस मूरखता को भला, कैसे कह दें भूल-
हम तो इसको मानते, लाइलाज है रोग।।

भक्ति शक्ति के मेल का, जो होता परिणाम।
उससे बन जाते सदा, अपने सारे काम।
जो अपने आराध्य पर, रखता है विश्वास-
उसका होता जगत में, इक दिन ऊँचा नाम।।

ईश्वर की चाहो कृपा, भक्ति कीजिए आप।
मुश्किल हो कितनी बड़ी, करना तुम मत पाप।
बाधा तो आती सदा, मत करना परवाह-
मिट जाएगा एक दिन, तव जीवन संताप।।

सच्चा साथी दे सदा, जीवन को आधार।
जिसके बिन सूना लगे, अपना ये संसार।
होना इतना चाहिए, दूजे पर विश्वास -
जीवन पथ होता सुगम, खुशियां मिले अपार।।
*******
पितरों का तर्पण करो, दे जल अक्षत फूल।
उनके ही आशीष से, मिटे हृदय के शूल।।
भूल-चूक होंगे क्षमा, शीश झुकाएँ आप-
छूमंतर होंगे सभी, दुख पीड़ा बन धूल।।

तर्पण श्रद्धा भाव है, नहीं मात्र यह कर्म।
पितरों का आशीष ही, इसका पावन मर्म।।
नादानी अब छोड़ दो, यही समय की माँग-
पूर्ण समर्पण से करो, जो है अपना धर्म।।

बेमौसम बरसात से, चिंतित सारे लोग।
यह तो ऐसा लग रहा, व्यर्थ लगा अभियोग।
प्रभु जी लीला आपकी, जाने नहीं जहान-
रो-रोकर है सोचता, मुफ्त मिला क्यों रोग।।

संयोजन करना नहीं, होता कोई खेल।
माथा-पच्ची संग में, करना पड़ता मेल।।
सबके वश की बात यह, कब होती आसान-
कुछ तो औंधे मुँह गिरे, जैसे तरु से बेल।।

**********
हिंदी दिवस
**********
हिंदी भाषा का करें, आप सभी सम्मान।
बात हमारी मानिए, नहीं आपको ज्ञान।
नहीं राष्ट्र भाषा बनी, रखिए इतना याद-
चिंता मत करिए मगर, भाषा हिंदी गान।।
*******
रोला मुक्तक
*******""
कटे सकल संताप, नाम जप नीम करोली।
मिटें जनम के पाप, धाम कैंची की बोली।
जोड़े सबको साथ, राम का मेरे धागा -
हो जाते भव पार, खा रहे हनुमत गोली।।

*******
सरसी छंद मुक्तक
********
कण-कण में भगवान बसे हैं, क्या नूतन है बात।
समझ रहा हर मानव प्राणी, पर दूषित जज़्बात।
जान-बूझकर अकड़ रहा है, करे पाप के कर्म-
प्रभु चरणों में शीश झुकाता, रखता मन प्रतिघात।।

झूठे वादे बाँट रहे हैं, नेता आकर द्वार।
इतना तो वो जान रहे हैं, झूठ-मूठ आधार।
उछल-कूद कर पैर पकड़ते, जोड़ें दोनों हाथ-
एक निवेदन केवल करता, बनवा दो सरकार।।

हमने भी अब सीख लिया है, इस दुनिया की रीत।
रहना सबसे दूर हमें है, नहीं करेंगे प्रीत।
किस्मत से तो हम बच निकले, ईश्वर का आभार -
इससे बढ़कर और भला क्या, हो सकती थी जीत।।

सुधीर श्रीवास्तव

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मुक्तकंठा छंद
*********
दुश्मन हैं जब हम सभी, मिले कहाँ आराम।
ईश्वर का फिर दोष क्या, होते जब बदनाम।।
लिखना चाहें हम सभी, एक नया इतिहास -
केवल खुद का चाहते, व्यक्ति परक आयाम।।
व्यक्ति परक आयाम, बने फिरते हैं सज्जन।
लगता है अब आज, आप खुद अपने दुश्मन।।१

दीक्षा अब जब ले लिया, बिना किसी तकरार।
नमन करूँ सौ बार क्यों, क्या हो रिश्तेदार।
कारण आप बताइए, मुझको नहीं गुमान-
या फिर मुझ पर आपका, कोई नया उधार।।
कोई नया उधार, व्यर्थ देते क्यों शिक्षा।
बड़े स्वार्थी आप, बहुत दूषित है दीक्षा।।२

विधि का अजब विधान है, जान रहे हैं लोग।
जैसी इच्छा ईश की, उसे रहे हैं भोग।
चाहे जितना दीजिए, आप किसी को दोष-
या तो फिर संतोष कर, मानो सब संयोग।।
मानो सब संयोग, खेल बस अपनी निधि का।
देख रहे हम रोज, अजब माया है विधि का।।३

नफ़रत की दीवार का, नशा बढ़ रहा आज।
आप सभी हैं जानते, क्या है इसका राज।
राजनीति का इन दिनों, ये कैसा है खेल-
भाईचारा एकता, पर गिरती नित गाज।।
पर गिरती नित गाज, बदलनी होगी सूरत।
करना होगा काम, दूर करने को नफरत।।४

देना हो तो दीजिए, बिना किए तकरार।
करनी कुछ भी कीजिए, पीछे है सरकार।
आप धुरंधर हो नहीं, डर जाएंगे लोग-
हमको भी इतना पता, कितना चढ़ा उधार।।
कितना चढ़ा उधार, नहीं कुछ हमको लेना।
कहें मित्र यमराज, सोच लो कितना देना।।५

सच्चा मिला न मीत तो, इतना हुए अधीर।
मानो मेरी बात अब, बनिए आप कबीर।
बिना मीत के भी चले, दुनिया मेरे यार-
निर्णय करना आपको, कृपा करें रघुवीर।।
कृपा करें रघुवीर, अगर खाना है गच्चा।
रहो ढ़ूँढ़ते आप, मीत जीवन भर सच्चा।।६

करिए नहीं कलेश अब, संकट हरो गणेश।
सबसे प्यारा आपको, कहते प्रभो महेश।
कहाँ मगन हो आप प्रभु, मोदक दो अब छोड़-
भक्त चाहते हैं सभी, बन जाएँ मधुरेश।।
बन जाएँ मधुरेश, आप मत इतना डरिए।
जितना समझो सरकार, कसम से उतना करिए।।७

जीवन पानी बूँद है, समझो मेरे यार।
समझो इतना आप भी, क्यों करना तकरार।
छोटी -छोटी बात पर, उलझ रहे हैं लोग-
नहीं सोचते क्यों भला, मानव मन का सार।।
मानव मन का सार, रहे हर प्राणी नीमन।
करें कृपा रघुनाथ, सुखद हो सबका जीवन।।८

करना क्यों विश्वास ही, जब धोखों का दंश।
वैसे मिलता है सदा, सबको अपना अंश।
जब इतना सब है पता, फिर किसका है दोष-
यही हमारे आपके, जीवन का अपभ्रंश।।
जीवन का अपभ्रंश, व्यर्थ क्यों हमको डरना।
जो जिसका है काम, उसे देना है करना।।९

जन के हित में है यही, नहीं करें मन छेद।
एक सूत्र अपनाइए, करिए कभी न भेद।
जन-मानस खुशहाल हो, ऐसा करो प्रयास -
भूल-चूक हो जाय तो, व्यक्त कीजिए खेद।।
व्यक्त कीजिए खेद, गिनो मन माला मनके।
खुशियों का बस राज, भावना समझो जन के।।१०

मेरा अंर्तमन जला, सहते सहते पीर।
आँखों में ही सूखते, बहने वाले नीर।
भला बताओ आप ही, क्या मेरा अपराध -
जो मेरे निज हृदय को, रहते निशदिन चीर।।
रहते निशदिन चीर, काल का क्या है घेरा।
या ईश्वर की चाह, परीक्षा लेना मेरा।।११

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा छंद
**********
पड़ा लिखा भी आज कल, धक्के खाता रोज।
मिलती नहीं है नौकरी, करे कहाँ तक खोज।।

जाने कैसे है बढ़ा, उनका धन भंडार।
और वही हैं कह रहे, झूठों की सरकार।।

राजनीति में तंत्र का, अपना अलग प्रभाव।
कोई भरता जेब है, कोई देता घाव।।

शासन सत्ता तंत्र जब, होता है मजबूत।
तभी देश आगे बढ़े, कोई नहीं अछूत।।

कुर्सी खातिर हो रहा, आज नया नित खेल।।
तंत्र -मंत्र की आड़ में, बेच रहे हैं तेल।।

कौन यहाँ गद्दार है, बड़ा प्रश्न है आज।
समझ नहीं है आ रहा, क्या है उसका राज।।

आया अवसर हाथ में, नहीं छोड़ना मित्र।
वरना होगा आपका, जीवन बड़ा विचित्र।।

अवसर उसे तलाशती, जिसको होती चाह।
जो झूठा नाटक करे, उसे नहीं दे राह।।

ईश्वर जो निर्णय करे, आप करो स्वीकार।
वही करेंगे मानिए, हर बाधा से पार।।

निर्णय सुन पित-मातु का, झुका लिया यदि शीश।
उनके ही आशीष से, कृपा करें जगदीश।।

लोग ताक में हैं यहाँ, कैसे खेले खेल।
करे ईश से प्रार्थना, हम हों कभी न फेल।।

मर्यादा को ताक पर, रखते हैं अब लोग।
बस करना संतोष है, मान इसे दुर्योग।।

मर्यादा रख ताक पर, माँगा दो वरदान।
कैकेई परिणाम से, नहीं रही अंजान।।

नीयत अपनी साफ रख, कष्ट लीजिए झेल।
सत्य राह काँटो भरी, अल्प समय का खेल।।

मीठी बोली से सभी, बन जाते हैं काम।
इससे पावन सुख कहाँ, मिले मुफ्त सुखधाम।

गोली मीठी खा जरा, रहो मगन मन आप।
हृदय नाम निज ईश का, करते रहिए जाप।।

तंग सभी के साथ हैं, नहीं दाम है जेब।
यही सबसे बड़ा, है प्राणी का ऐब।।

रिश्ते भी अब तंग है, नहीं मधुरता भाव।
सहने को मजबूर हैं, नित नूतन ही घाव।।

खाली रहते हैं मगर, मिले कहाँ आराम।
सोच रहा हूँ रात-दिन, करना क्या है काम।।

मिले कहाँ आराम अब, जीवन में जब द्वंद्व।
करते रहते हम सभी, नाहक ही छलछंद।।

कलमकार जितने यहाँ, सभी बड़े हैं मस्त।
लिखते-पढ़ते कुछ नहीं, मगर सभी हैं पस्त।।

नहीं पाँव जंजीर है, फिर भी कैद शरीर।
मन के बंधन खोलिए, आप मिटेगी पीर।।

सोने की जंजीर भी, लगती जैसे भार।
अगर नहीं मिलता हमें, जीने का आधार।।

शर के जैसा चुभ रही, मुझको तेरी बात।
समझ मुझे आया नहीं, ये तेरा प्रतिघात।।

द्वारे आया पर्व है, फैला हर्ष अपार।
सजे-धजे घर कह रहे, कृपा करो दातार।।

उत्सव जीवन राग है, धड़कन में उल्लास।
प्रेम बना संगीत है, छाया जस मधुमास।।

बंधन प्यारा जोड़ने, आता है त्यौहार।
रंग, गुलाल, मिठास भी, दस्तक दे हर द्वार।।

समारोह है लग रहा, सपनों का संसार।
बाँटो खुशियाँ सब मिले, जीवन का है सार ।।

धरा महोत्सव धमक से, गूँज रहा है गान।
संस्कृति के रंग-रुप से, दमके सकल जहान।।

कायरता से व्यर्थ है, रखना झूठी आस।
टकराने वाला ‌ सदा, रचता है इतिहास।।

चाहे जितना कीजिए, आप सभी नित शोर।
नेताओं के कान तो, सुनने में कमजोर।।

कहे नीति चाणक्य की, छल से कर परहेज।
रिश्ते-नाते सत्य के, आप बढ़ेगा तेज।।

मेरा अपना हौसला, है मेरी पहचान।
आप मुझे मत दीजिए, झूठ -मूठ का ज्ञान।।

लेकर आता है क्षमा, पर्यूषण का पर्व।
बैर-भाव तज कीजिए, आप धर्म पर गर्व।।

मान क्रोध माया तजो, और लोभ का संग।
जीवन में होगा सदा, खुशियों का नवरंग।।

सतगुरु की केवल कृपा, एकमात्र आधार।
कर सकते हैं बस वही, भवसागर से पार।।

राजनीति में जो गधे, रेंक रहे हैं खूब।
नहीं ज्ञान का बोध है, व्यर्थ सड़े तरबूज।।

आज गधों के शीश पर, अर्थ व्यवस्था पाक।
पिंड छुड़ाने के लिए, ढ़ूँढ़ रहे हैं ताक।।

ईश्वर से कहते गधे, यह कैसा अन्याय।
हमको मिलता क्यों नहीं, ढूँढ़े कोई उपाय।।

विधि का अजब विधान है, इसमें क्यों है रार।
होगा निश्चित बस वही, जो है विधि का सार।।

इतना तो सबको पता, विधि का अजब विधान।
फिर क्यों खाते हम फिरें, बने हुए नादान।।

विधि का अजब विधान जो, टाल सका है कौन।
ज्ञानी तुम कितने बड़े, फिर भी रहिए मौन।।

दाहिर ही यदि सत्य है, व्यर्थ आवरण खोज।
अक्षर-अक्षर जो लिखा, हृदय धारिए रोज।।

राजा दाहिर सा अडिग, मन जिसका हर बार।
एक एक पल सीखना, जीवन का व्यवहार।।

सभी शक्ति में चूर हैं, यही आज सिद्धांत।
जैसे लगता हो गए, आज बड़े वेदांत।।

शहरों में कंक्रीट के, बने घोंसले खूब।
गाँवो से अब दूरियाँ, जाती लेकर डूब।।

शहरों में जो घोंसला, कहते सभी मकान।
मानव अब धन के लिए, भाग-भाग हलकान।।

आज दिलों में फासला, बढ़ा रहे हैं लोग।
नहीं समझते क्यों भला, लाइलाज यह रोग।।

तन-मन अर्पण कर दिया, नंदलाल गोपाल।
तेरे बिन मेरा कौन है, पूछेगा जो हाल।।

आया है नेपाल में, प्रलय बड़ा गंभीर।
संकट के इस दौर में, होते सभी अधीर।।

चहुँदिश में है दिख रहा, बिछा मौत का जाल।
नहीं पता किस ओर से, आ जाएगा काल।।

बिछा मौत का जाल हम, भरते निज भंडार।
नहीं बोध इतना हमें, बनते यम के यार।।

बिछा मौत का जाल जो, उस पर देना ध्यान।
इसके पीछे का छिपा, भूल आप विज्ञान।।

व्यर्थ मान-सम्मान की, चिंता करते लोग।
मानव में नित बढ़ रहा, अब ये भारी रोग।।

कर सकता कोई नहीं, अब मेरा अपमान।
पढ़ा नहीं मैंने अभी, जो इसका विज्ञान।।

हर संभव कोशिश करो, व्यर्थ नहीं हो रार।
अच्छा होगा बस यही, बना रहे व्यवहार।।

क्या लेकर जाना भला, जो इतना है रार।
कहें मित्र यमराज जी, चुकता नहीं उधार।।

अपने ही करने लगे, अब अपनों पर वार।
बेबस होकर सह रहे, बिना विरोध प्रहार।।

कलयुग के प्रहार का, सहता मानव दंश।
पीट-पीट माथा कहे, यही हमारा अंश।।

अपने हित की बात बस, करते रहते लोग।
कौन भला अब देखता, इक दूजे का रोग।।

सच्ची-झूठी बात तो, करते रहते लोग।
लोनी सूरत आड़ मे, करते हैं हठयोग।।

अब अटूट रिश्ते यहाँ, झटपट जाते टूट।
बहुत कठिन है मानना, जाते कैसे लूट।।

आशा फल की व्यर्थ है, किया नहीं जब कर्म।
सबको ही तो है पता, क्या है उसका धर्म।।

कर्म तभी होंगे सुफल, जब हो पावन भाव।
बेमन से यदि कर रहे, मिलते गहरे घाव।।

हमको इस परिणाम का, पहले से था बोध।
इसीलिए आते रहे, पग-पग पर अवरोध।।

जो भी हैं उपलब्धियाँ, उसका व्यर्थ गुमान।
रहना हमें जमीन पर, सदा रहे ये ध्यान।।

आज नतीजा सामने, श्रम का पूरा सार।
पर इसमें मत देखिए, अपना जीवन सार।।

हिंदी भाषा का करें, आप सभी सम्मान।
बात हमारी मानिए, नहीं आपको ज्ञान।।

नहीं राष्ट्र भाषा बनी, फिर भी पूरा गान।।
चिंता मत करिए मगर, भाषा हिंदी गान।।

माटी चूल्हे पर चढ़ा, तवा हो रहा गर्म।
खुद जलकर पूरा करे, जो है उसका धर्म।।

रोटी चढ़कर तवे पर, करती नृत्य निनाद।
तवा पकाता है उसे, बिना सुने फरियाद।।

आँख दिखाते हो मुझे, खुदा मानकर आप।
चढ़ा रहे हो शीश निज, नादानी में पाप।।

आशय अपना साफ है, भले न समझो आप।
इसीलिए तो कर रहे, झूठा ज्ञान प्रलाप।।

महज वस्त्र होता नहीं, निर्धारित गणवेश।
यह बतलाता है हमें, सब हैं यहाँ नरेश।।

एक रूप अरु रंग का, मोहक सा परिवेश।
जब सब हों गणवेश में, लगें सभी अवधेश।।

*******
पुस्तक
*******
तकनीकी संसार की, माया अपरंपार।
पुस्तक पढ़ना हो गया, जैसे भारी भार।।

पुस्तक कोने में पड़ी, है कितनी लाचार।
फोन सभी के हाथ में, आज समय का सार।।

पुस्तक हमसे पूछती, भूले क्यों मम नाम।
मेरे बिन क्या जगत को, मिल सकता आयाम।।

पुस्तक में अब भी बसा, जीवन का संसार।
इक-इक पन्ना देखिए, भागे दूर विकार।।

पुस्तक कहती प्यार से, लौटो मेरे द्वार।
तकनीकों के संग दूँ, तुमको ज्ञान अपार।।
********
नफरत की दीवार
*********
नेताओं में होड़ है, बन जाए सरकार।
खींच रहे हैं इसलिए, नफरत की दीवार।।

नफरत की दीवार का, दरक रहा आधार ।
जुटा रहे थे वोट जो, किया उसी ने वार।।

नफ़रत की दीवार का, जो करते निर्माण।
उनको तो बस दिख रहा, केवल निज कल्याण।।

नफरत की दीवार से, सत्ता की दरकार।
बिना शर्म संकोच के, वोटों का व्यभिचार।।

जाति-धर्म की आड़ में, मची हुई है रार।
खिंचती कुर्सी लोभ में, नफरत की दीवार।।

सबसे पहले स्वयं का, लेते रहिए टोह।
रोना-धोना व्यर्थ है, मिलना हमें विछोह।।

खुद की टोह से ही खुले, मन के सारे भेद।
रोता सारा संसार है, फिर क्यों करना खेद।।

खुद को जाना जिस घड़ी, सारा दूर विषाद।
व्यर्थ आप हम ढो रहे, झूठ-मूठ अवसाद।।
********
बस्ती हुई तबाह
********
हम सबका ही दोष है, भले निकलती आह।
आया द्वारे कर्मफल, बस्ती हुई तबाह।।

रोना-धोना व्यर्थ है, बस्ती हुई तबाह।
विवश आप हमने किया, प्रकृति चली इस राह।।

आया ऐसा जलजला, बस्ती हुई तबाह।
सब मिल सबकी कर रहे, दूजे की परवाह।।

बस्ती हुई तबाह क्यों, अब तो करो विचार।
छेड़छाड़ को रोकना, आज समय दरकार।।

बस्ती हुई तबाह तो, मान लीजिए भूल।
वरना आगे झेलना, इससे गहरा शूल।।

अंतराल का दीखता, कदम-कदम पर रंग।
कुछ के हिस्से में खुशी, और किसी के जंग।।

सकल विश्व में गूंजता, अब भारत का नाम।
और करें बदनाम वे, जो बिल्कुल नादान।।

सकल विश्व में गूँजता, चर्चा युद्ध की रोज।
कोशिश भी कुछ हो रही, चले शांति की खोज।।
*******
जन्माष्टमी विशेष
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जन्मदिवस श्री कृष्ण का, जन्माष्टमी विशेष।
जन मानस में हर्ष है, गिनते सभी निमेष।।

रात्रि आज जन्माष्टमी, ब्रज में खुशी अपार।
नंद यशोदा गृह में, जन्मे कृष्ण मुरार।।

आज कृष्ण जन्माष्टमी, चहुँदिश फैला हर्ष।
सबकी चाहत एक है, पाएँ कृष्ण का दर्श।।

आ जाओ श्री कृष्ण जी, करो धरा कुछ काम।
बंशी को भी दीजिए, अब थोड़ा विश्राम।।

हलधारी बलराम जी, धरा आइए आप।
कान्हा जी के संग में, आज मिटाओ पाप।।

केवल कृष्ण को पूजना, नहीं आपका धर्म।
पहले आप सुधारिए, अपना जीवन कर्म।।

कृष्ण जन्म के साथ ही, बस इतनी सी आस।
बहन-बेटियाँ चाहतीं, रक्षा का विश्वास।।

गीता के उपदेश का, अगर तनिक है ध्यान।
तभी सफल है आपका, कृष्ण जन्म विज्ञान।।

संदेशा है कृष्ण का, सुनिए पहले आप।
पहले हृदय पवित्र कर, फिर कर पूजा जाप।।

नंदलाल दरबार में, जाते हैं कुछ लोग।
जो फैलाते नित नया, तरह-तरह का रोग।।
*******
मृत्यु
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कहें मित्र यमराज जी, मृत्यु बनी हमराह।
नाहक मैं करता नहीं, व्यर्थ कभी परवाह।।

करो मृत्यु से मित्रता, खुशियाँ मिलें अपार।
इससे सुंदर है नहीं, करो ईश आभार।।

मित्र बना यमराज है, जिन लोगों का आज।
डरें नहीं वो मृत्यु से, शीश सजाए ताज।।

यम जिसका भी मित्र है, आज वही सरताज।
डरे नहीं वो मृत्यु से, धरे शीश नव ताज।।

यम तो मेरा यार है, और मृत्यु हमराह।
अब तो करना व्यर्थ है, नाहक ही परवाह।
********
दुर्घटना के बाद
*********
दुर्घटना के बाद अब, व्यर्थ पीटना माथ।
छोड़ गया जो प्राण निज, कैसे देगा साथ।।

नीति नियम सिद्धांत सब, आते सबको याद।
चिंतन मनन विचार सब, दुर्घटना के बाद।।

दुर्घटना के बाद ही, कुछ की खुलती राह।
धन आ जाता जेब में, तब कैसी परवाह।।

दुर्घटना के बाद में, बातें होती खूब।
कुछ दिन चर्चा बाद फिर, जाती जैसे डूब।।

दुर्घटना के बाद में, जग जाती सरकार।
सत्ता शासन तंत्र का, यही श्रेष्ठ आधार।।
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गुरु-शिक्षक विभेद
********
गुरु शिक्षक में भेद है, क्यों कर फँसते आप।
बैठे-ठाले ले रहे, अपने सिर पर पाप।।

क्या गुरु शिक्षक के बिना, मिला किसी को ज्ञान।
दोनो एक समान हैं, बनो नहीं नादान।।

गुरु शिक्षक इस जगत में, हैं सबसे अनमोल।
इन्हें अलग कर तोलना, व्यर्थ आप भूगोल।।

गुरु दर्शन की दृष्टि दे, शिक्षक शिक्षा ज्ञान।
दोनों की ही लक्ष्य है, जीवन का उत्थान।।

गुरु शिक्षक में भेद का, जो करते हैं पाप।
रहते खाली हाथ हैं, सहते हैं संताप।।

दिव्य दृष्टि से गुरु सदा, करते मार्ग प्रशस्त।
शिक्षक शिक्षा ज्ञान से, जीवन बाधा पस्त।।

गुरु शिक्षक को मानिए, सबसे आप महान।
जीवन पथ पर आपका, ऊँचा होगा मान।।
******
विधवा
********
विधवा को वैसे सदा, होता बहुत तनाव।
नहीं समझते हैं सभी, उसके मन का घाव।।

विधवा का क्या दोष है, ताना देते लोग।
समझे नहीं समाज यह, या केवल संयोग।।

विधवा को भी दीजिए, उचित मान-सम्मान।
आज बदलते समय का, है सद्कर्म विधान।।

विधवा के सिर हाथ रख, संबल दे परिवार।
तब उसका जीवन बने, सामाजिक सत्कार।।
********
राशन
********
मिलता राशन मुफ्त में, करें व्यर्थ क्यों काम। हम कर सकते हैं नहीं, मोदी को बदनाम।।

लेकर राशन मुफ्त का, बेंच रहे कुछ लोग।
टीका इसका है नहीं, बढ़ता जाए रोग।।

राशन की उम्मीद में, टूटी माँ की आस।
बच्चे भूखे सो गए, कर कल का विश्वास।।

जितना राशन सड़क गया, उससे कम थी भूख।
कागज में तो लिख दिया, भूख गई सब सूख।।

राशन पानी भाव का, रखते नहीं हिसाब।
जो पाते हैं माह में, वेतन बही किताब।।
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मतदान
*******
करना सबको चाहिए, निश्चित ही मतदान।
तभी प्रगति की राह पर, चल सकता अभियान।।

लालच में करना नहीं, हमें कभी मतदान ।
उचित चयन से देश को, मिले नया आयाम।।

कीमत अपने वोट की, नहीं लगाना आप।
और कभी मतदान को, नहीं समझना पाप।।

अगर आप हैं चाहते, अच्छी हो सरकार।
लोकतंत्र मतदान का, एकमात्र आधार।।

क्या मेरे मतदान से, बन सकती सरकार।
भूल रहे कर्तव्य निज, सिर्फ याद अधिकार।।
*******
गणेश जी
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पूजा थाल सजाइए, ऊपर कलश सुजान।
रिद्धि सिद्धि संग आइए, प्रथम पूज्य भगवान।।

कलश रखो जल गंग भर, फिर कर दूजा काम।
हाथ जोड़ विनती करो, श्री गणेश के नाम।।

करो कलश स्थापना, सजा आरती थाल।
हर्ता विघ्न गणेश जी, उच्च करेंगे भाल।।

रिद्धि-सिद्धि के संग में, श्री गणपति महाराज।
आकर आप विराजिए, सँवर जाय मम काज।।

रिद्धि बाँटती सम्पदा, सिद्धि ज्ञान भंडार।
गणपति जी की हो कृपा, सुखी रहे संसार।।
********

सुधीर श्रीवास्तव

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माँ शारदे वंदना

हे हंसवाहिनी, ज्ञानदायिनी,
मातु शारदे मैया मेरी,
हम शरण में तेरे आए हैं।
अंधकार मिटा दो मन का मेरे,
ज्योति का दीप जलाए हैं।

वीणा के तारों से झंकृत,
स्वर अमृत बरसा दो माँ।
जिह्वा पर आप विराजो,
शब्दों को मधुर बनाओ माँ।

पुस्तक धारिणी, शुभ्र वसना,
कमल आसन पर शोभित माता।
मूर्खता मेरी हर लो,
विद्या-ज्ञान का वर दे दो,
सुख-समृद्धि की चाह नहीं,
बुद्धि-विवेक से पावन कर दो।

हे मातु शारदे, कृपा करो,
हम अज्ञानी बालक तेरे।
चरणों में शीश झुकाते हैं माँ,
भवसागर से पार करो माता।

-सुधीर श्रीवास्तव

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अनमोल जीवन और यमराज
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जीवन अनमोल है, इसमें नया क्या है
सवाल जटिल था, जिसे आकर मित्र यमराज ने उठाया,
उत्तर देना भी जरूरी था,
उसके कोप भाजन से बचना उससे भी ज्यादा जरूरी था।
अपने मन की पीड़ा भला मैं उसे कैसे बताता?
मगर कुछ न कुछ तो कहना ही था।
मैंने कहा - मित्र! नया तो कुछ भी नहीं है
बस कलयुग का थोड़ा रंग चढ़ गया है,
कहने भर के लिए अब जीवन अनमोल रह गया है।
क्योंकि कब कौन, कहाँ और कब तक सुरक्षित है
उसकी आने वाली, सुबह, शाम या रात बहुप्रतीक्षित है
प्रतीक्षा खत्म होगी या हमेशा बनी रहेगी
यह कह पाना भी आज बहुत मुश्किल है।
अपने ही अब अपनों को मार रहे हैं,
एक दूजे के सबसे बड़े दुश्मन बन रहे हैं,
दुर्घटनाओं का दौर लगातार बढ़ रहा है,
आत्महत्या भी अब साँप-सीढ़ी के खेल जैसा हो गया है
फिर भी जीवन अनमोल है, बस ये ही नया है।
अपराध ऊँचाइयों का हिमालय बन रही हैं,
किसी की जान ले लेना आसान हो गया है,
रिश्तों में नित नया जहर घुलता जा रहा है
हर आँख़ में संदेह का बादल गहराता जा रहा है,
आए दिन पाक रिश्ते भी नापाक हो रहे हैं
मातृशक्तियाँ खुद को असुरक्षित महसूस कर रही हैं,
डर के साए में एक-एक दिन काट रही हैं,
बस यही हमारा नया जीवन अनमोल है।
यमराज ने मुझे रोका - बस प्रभु! अब रहने दो
जीवन कितना अनमोल है,
यह बात बहुत अच्छे से जान गया हूँ,
आपके लोक के इस अनमोल जीवन का
अद्भुत रहस्य अंतर्मन में उतार चुका हूँ।
बस! अब आप मेरी सलाह मानो
और मेरे साथ चलकर यमलोक का आनंद लो,
क्योंकि अब मुझे आपके मुखारबिंद से
इस अनमोल जीवन के बखान से डर लगने लगा है।
वैसे भी मुझे तो बस आपकी चिंता है
क्योंकि यहाँ तो और कोई मेरा सगा नहीं है,
दोनों मिलकर वहाँ जीवन का आनंद उठाएंगे,
अनमोल जीवन वास्तव में क्या होता है
सोशल मीडिया के माध्यम से धरावासियों को बताएंगे,
अनमोल जीवन का भाव अपने हिसाब से लगाएंगे।
अपनी शर्तों पर समय-समय पर इसका भाव बढ़ाएँगे,
अनमोल जीवन का असली सूत्रधार बन
सबसे पहले हम दोनों ही नाम कमाएँगे,
फिर सदा के लिए इतिहास बन अमर हो जाएँगे।

सुधीर श्रीवास्तव

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