"मां..... एक सागर है।"
ना जाने कितना दर्द सा होगा माँ ने,
जब मुझे इस दुनिया में लाया था,
कहती है भूल गई थी सारा दर्द,
जब तुझे गोद में उठाया था।
कैसे वह बिना रुके,
घर का सारा काम कर लेती है,
उठ जाती है सबसे पहले,
जबकि आखिर में वह सोती है।
भूख भी नहीं लगती क्या उसे?
सबको खिला कर फिर कहती है,
कहती है तुमको प्यार से खाता देख,
मेरी भूख मिट जाती है।
वह मां है, बेटी भी,पत्नी भी, और बहू भी,
इतना सिर्फ इतना सब ना जाने कैसे वह संभालती है,
सबके मुंह से सिर्फ तुम्हारे नाम निकलता,
जब घर में कोई चीज गुम हो जाती है।
चोट तो मुझे लगती पर,
रोना मां को आता है,
सुकून की नींद मुझे आती है,
भूल जाती हूं सारा दुख,
जब वह मुझे प्यार से सहलाती है।
हम कितने ही बड़े हो जाएंगे पर,
मां का दुलार कभी कम ना होगा,
कुछ गलतियां भी हमसे होंगी,
जिनका हमें पता भी होगा,
फिर भी ना कभी वह शिकायत करेगी,
ना उसे कोई गम होगा।
क्योंकि कहते हैं ना मां... वो सागर है,
जिसकी गहराई नापना बहुत मुश्किल है,
पर वादा है मेरा एक दिन तुम घर से कहोगी,
मेरी बेटी भी काबिल है।
- आँचल नलवाया
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