हल्ला मचा है धन कमाने का शहर में,
सुकून की अमीरी देखी है मैंने गाँव में।
भाग-दौड़ में रिश्ते अक्सर छूट जाते हैं,
समय ठहर-सा जाता है अब भी गाँव में।
ऊँची इमारतें तो आसमान छू लेती हैं,
झुककर सलाम करती है धूप भी गाँव में।
चेहरों पे नकाबों की परतें चढ़ी मिलीं,
सादा-सा दिल धड़कता है खुलकर गाँव में।
शहरों की चमक आँखों को भा तो जाती है,
आत्मा को सुकून मिलता देखा है मैंने गाँव में।
थककर जब लौटता हूँ भीड़ के समंदर से,
माँ सी ठंडी छाया मिलती है गाँव में।
रंगों की बरसात भी फीकी लगे शहर में,
माटी की खुशबू संग भीगी है होली गाँव में।
'कल्प' ने देखा है सच दोनों जहाँ का,
सोना बहुत मिलेगा, पर चैन है गाँव में ॥
- पंकज गोस्वामी 'कल्प'