“जो दिखा, वो था नहीं”
हमने हर शख़्स में बस सच्चाई ही देखी थी,
अपनी नज़रों में अजब गहराई भी देखी थी।
जिसको अपना कहा, वार वही कर बैठा,
हर मुलाक़ात में गहरी परछाई ही देखी थी।
रिश्ते सींचे थे बड़े शौक़ से हमने लेकिन,
उनकी फ़ितरत में मगर तनहाई ही देखी थी।
हँसते चेहरों के तले दर्द छुपा था कितना,
हर हँसी में कोई रुसवाई ही देखी थी।
वक़्त ने खोल दिए राज सभी धीरे-धीरे,
हर दिखावट में छुपी सच्चाई ही देखी थी।
‘प्रसंग’ अब हर क़दम ज़रा संभाल के रखता,
अब वही राह न पहले-सी अच्छाई देखी थी।
- प्रसंग
प्रणयराज रणवीर