हां हम बड़े हो गए पार्ट 1
कविता
हां हम बड़े हो गए
स्कूल छुट्टी कॉलेज खत्म हो गई
हां हम बड़े हो गए
हाथों से खिलौने छोटे
किताबें साइड में रह गए
हाथों में बस झाड़ू पोछा रहेगी
और दिमाग में गरस्ती का जिम्मेदारी
हां हम बड़े हो गए
उम्र में
सच में
पर हम बड़े नहीं हुए कभी
खुद के भावनाओं को संभालने के लिए
हां हम बड़े रहे हमेशा
खुद की भावनाओं को छुपाने के लिए
पर हम बड़े हुए ही नहीं
राहों पर कभी अकेले चलने के लिए
पर हम बढ़े रहे सबको संभालने के लिए
भलो हम खुद को ना संभाल सके
अपनी भावनाओं को ना सामान सके
पर हम जिम्मेदारियां को संभाल सकते हैं
क्योंकि जिम्मेदारियां के लिए
हम बड़े होते हैं
खुद के लिए नहीं
खुद के फैसले लेने के लिए नहीं
क्या करना है हमें
यह फैसला लेने के लिए नहीं
कहां जाना है क्या पहना है
और क्या खाना है
यह डिसाइड करने के लिए
हम कभी बड़े हुई ही नहीं
बस बड़े हो गए हैं
समाज की तरफ से
हम बच्चे नहीं रहे
हम रो नहीं सकते
जब हमें तकलीफ हो
हम जोर-जोर से हंस नहीं सकते
जब हम खुश हो
हम शिकायत भी नहीं कर सकते
जब हमें दर्द हो
हम किसी को ना भी नही कहे सकते
चाहे हम किसी के हमी में खुद को
कुर्बान ही क्यों नाकर दे
इस हद तक हम बढ़े हैं
अगर कविता आप सबको पसंद आए तो
आगे बढ़ते रही
मैं आपकी प्रिय लेखक अभीनिशा❤️🦋💯