मोड़ और मंज़िल
आज उस मोड़ पर खड़ी,
रास्ते दो, पर मंज़िल वही।
समझ नहीं आता क्या करना है,
पर आखिर मुझे चुनना तो है।
एक रास्ता और बंद पिंजरा,
एक रास्ता खुला आसमान।
कुछ पल मिले, अपने लिए,
क्योंकि पंछी का भी हार जाना है।
अब कहाँ हूँ मैं, पता नहीं,
खो गई, या सो गई, या मान ली हार है?
पर इतनी कमज़ोर नहीं मैं,
ना हार मानूँ, ना रुकूँ,
ना अपने और ना उस आसमान में।