बात बढ़ी बगावत पे जा पहुँची
बगावत बढ़ी अदावत पे जा पहुंची
महज इतना ही कहा था सर न झुकायेगें
बात सर की सहादत पे जा पहुँची
बेजार था उनसे, मनाने को मुझको
निगाह उनकी शरारत पे जा पहुँची
सुबह हुआ जन्नत सा आगाज, शाम तक तबीयत कयामत तक जा पहुंची
बरसे हैं बादल, बाद मुददत के
आग बुझते-बुझते राहत पे जा पहुंची
अर्थ
अदावत= दुश्मन
सहादत= शहीद
बेज़ार = नाराज
आगाज= शुरूवात