वक़्त जो ठहरता नहीं....
क्या मसला है इस वक़्त का, जो कभी ठहरता नहीं,
सदियाँ गुज़र जाती हैं, पर यह कभी थकता नहीं।
कभी धूप की चादर ओढ़ता, तो कभी छाँव बनकर ढलता है,
कैसा है यह मुसाफ़िर, जो किसी मोड़ पर रुकता नहीं।
हो महलों की रौनक़ें, या ग़रीबों का सूना आँगन,
गुज़र जाता है हर दर से, यह किसी के लिए थमता नहीं।
कभी घाव भर देता है तो कभी नए जख्म देता है,
निकाल देता तो है हर दर्द से मगर निशान छोड़ देता है।
शिकवे-शिकायतें छोड़, चल इसका हाथ थाम लें ऐ 'राही',
यह वक़्त है साहब, बस एक बार मिलता है, दोबारा नहीं।
-MASHAALLHA