गजल दीवार
एक ही घर, हम दोनो हैं, फिर यह कैसी दीवार है,
एक दर्द कितना बेरहम, जो आर और पार है।
एक घुटन सी होती है, वो क्यों नही समझता ,
जख्म गहरा लगता है, हर बात में तेरी वो धार है।
भूला न पाऊं तुम्हे मोहब्बत हर रोज बढता है,
इशारे क्यों नही समझता, जो तू इतना समझदार है।
भरोसा उठ गया अब तो,आबो-हवा में भी है हलाहल,
एक ही बार में खत्म कर दो न, क्यों डंसता बार-बार है।
✍️बेनी सागर