" अरे नकारात्मकता "
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अरे नकारात्मकता
शायद तुझको भान नहीं है,
इस जीवन में, सुन,
तेरा कोई स्थान नहीं है........।
बाग बगीचों में दिनदिन भर
ओल्हा पाती खेले,
गाँव, गली, पौढ़ी, पगडंडी,
काँटा, कूशा झेले,
गाय चराए, गोबर फेंके,
चारा पानी ढोए,
सिर के ऊपर, लहन लादकर,
मुस्कुराहटें बोए,
सबको है मालूम
यहाँ कोई अनजान नहीं है....
इस जीवन में, सुन, तेरा कोई स्थान नहीं है....।
भले नियति ने हमें, हमेशा,
नंगे पाँव चलाया,
भले, चटकती दोपहरी ने,
नंगी पीठ जलाया,
अरे, भले ही अपने हिस्से,
सूखे मौसम आए,
रोटी चटनी, गुण,अचार सब
चटखारे से खाए,
इन सब बातों में अपना
कोई अपमान नहीं है.....
इस जीवन में, सुन, तेरा कोई स्थान नहीं है......।
बदरी बरखा शीत घाम सब
सम स्वभाव से काटे
दुख विपत्ति भी, हँसते हँसते,
हाथों हाथों बाँटे
अपनी जिद है, चुनौतियों से,
टकराते रहने की,
कठिनाई को सोच समझकर
सुलझाने,सहने की,
यहाँ तनिक भी कुंठा का
आदान-प्रदान नहीं है....
इस जीवन में, सुन, तेरा कोई स्थान नहीं है.......।
@सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही