रोटी, कपड़ा और मकान
रोटी की खुशबू में बसती है जीवन की पहली आस,
भूखे पेट की हर धड़कन पूछती है जीने का विश्वास।
कपड़ा केवल तन का आभूषण नहीं,
यह आत्मसम्मान की चादर है,
जो धूप में छाया बनती है,
और ठंड में उम्मीद का सहारा।
मकान केवल ईंटों का ढेर नहीं,
यह सपनों का घर है,
जहाँ माँ की ममता दीवारों में गूंजती है,
पिता का संघर्ष नींव बनकर खड़ा रहता है,
बच्चों की हँसी आँगन में खिलती है,
और बुज़ुर्गों की दुआएँ छत बनकर बरसती हैं।
लेकिन आज भी इस धरती पर
कितने ही लोग ऐसे हैं,
जिनके हिस्से में भूख आती है,
पर रोटी नहीं।
जिनके शरीर पर मौसम बदलते हैं,
पर कपड़े नहीं।
जिनकी रातें खुले आसमान के नीचे कटती हैं,
पर अपना घर नहीं।
किसी के लिए रोटी का एक टुकड़ा
सिर्फ भोजन है,
तो किसी के लिए वह
पूरे दिन की मेहनत का सपना है।
किसी के लिए कपड़े फैशन हैं,
तो किसी के लिए फटे वस्त्रों में भी
सम्मान बचाए रखना संघर्ष है।
किसी के लिए मकान एक निवेश है,
तो किसी के लिए
एक छोटी-सी झोपड़ी ही पूरा संसार है।
भूख कभी धर्म नहीं पूछती,
न ही जाति का नाम जानती है।
ठंडी हवा यह नहीं देखती
कि कौन अमीर है और कौन गरीब।
बारिश की बूंदें हर सिर पर गिरती हैं,
लेकिन हर सिर के ऊपर छत नहीं होती।
जब तक किसी बच्चे की आँखों में
भूख के आँसू हैं,
जब तक किसी माँ के हाथ
खाली बर्तन टटोलते हैं,
जब तक कोई मजदूर
दिनभर पसीना बहाकर भी
अपने परिवार को दो वक्त की रोटी
नहीं खिला पाता,
तब तक विकास अधूरा है।
समाज की सच्ची प्रगति
ऊँची इमारतों से नहीं,
बल्कि इस बात से मापी जाएगी
कि क्या हर इंसान को
सम्मान से जीने का अवसर मिला।
क्या हर बच्चे को भोजन मिला?
क्या हर स्त्री सुरक्षित घर में सोई?
क्या हर बुज़ुर्ग के सिर पर छत रही?
रोटी केवल भोजन नहीं,
जीवन का अधिकार है।
कपड़ा केवल वस्त्र नहीं,
मानव गरिमा का सम्मान है।
मकान केवल चार दीवारें नहीं,
सुरक्षा, अपनापन और भविष्य की नींव है।
आओ ऐसा समाज बनाएँ
जहाँ कोई भूखा न सोए,
कोई तन ढकने को तरसे नहीं,
कोई बेघर होकर
आसमान को अपना घर न कहे।
जब हर थाली में रोटी होगी,
हर तन पर सम्मान का कपड़ा होगा,
हर परिवार के पास अपना आशियाना होगा,
तभी सच्चे अर्थों में
मानवता मुस्कुराएगी,
तभी राष्ट्र समृद्ध कहलाएगा,
और तभी यह धरती
सभी के लिए समान आशा,
समान सम्मान और समान अवसर की धरती बनेगी।
रोटी, कपड़ा और मकान—
ये केवल तीन शब्द नहीं,
हर इंसान के जीवन का अधिकार हैं।
जब तक ये अधिकार सबको नहीं मिलते,
तब तक हमारी संवेदनाएँ अधूरी हैं।
और जिस दिन हर चेहरे पर
सम्मान की मुस्कान होगी,
उसी दिन मानवता की सबसे सुंदर कविता पूरी होगी।