" परवाज़-ए-इश्क़ "
धड़कनों में आज नया एक साज़ होने लगा है,
जब से इस दिल में तेरा आग़ाज़ होने लगा है।
मेरी हर सांस में बस तेरा अंदाज़ होने लगा है,
जब से मुझ पर एक तेरा ही नाज़ होने लगा है।
बिन तेरे मेरा हर एक दिन उदास होने लगा है,
यह दिल अब तेरा करम-नवाज़ होने लगा है।
छुपाए भी नहीं छुपती यह तेरी चाहत अब तो,
तुझे देखने को दिल बेताब आज होने लगा है।
तेरी यादों का हम करें भी तो अब क्या करें?
हर इक नज़ारा भी मुझसे नाराज़ होने लगा है।
तेरी एक झलक देखने को ये दिल है बेकरार,
तेरी जुदाई का हर लम्हा दराज़ होने लगा है।
मिलकर तुझसे मिल गई जैसे पंखों को उड़ान,
मेरे इश्क़ का आसमान में परवाज़ होने लगा है।
भूलकर इस दुनिया को, बस तुझे पा लें हम,
"व्योंम" तेरी बांहों का मोहताज होने लगा है।
✍...© विनोद. मो. सोलंकी " व्योम "
जेटको (GEB) अंजार. मु. रापर.