“जो उम्र बची है”
एक उम्र ढलने को है
और एक लम्हा है
जिसे अब तक जिया नहीं।
बचपन रेत-सा था,
हथेलियों में ठहरा भी नहीं
और पलकों से फिसल गया।
जवानी आई
तो ख़्वाब साथ लाई,
मगर ज़रूरतों ने
एक-एक करके
उनकी आवाज़ धीमी कर दी।
हम हर रोज़ कहते रहे
आज नहीं…
कल जिएँगे।
और पता ही नहीं चला
कब वो कल
हमारी पूरी उम्र ले गया।
अब बचपन से क्या माँगूँ,
वो तो मुझे बड़ा कर चुका।
जवानी से क्या माँगूँ,
उसने मुझे थकना सिखा दिया।
और बुढ़ापे से
बस इतना चाहूँगी
जब वह आए
तो मेरे पास
कोई बड़ा सपना नहीं,
बस एक शांत मन बचा हो।
एक शाम
जिसमें कोई जल्दी न हो।
एक रात
जिसमें कोई पछतावा न हो।
और एक साँस…
जिसे लेते हुए
मुझे पहली बार लगे
मैंने ज़िंदगी को
कल के लिए नहीं,
आज के लिए जिया था।
प्राची गुर्जर …..