ज़ीस्त के फ़नकार
नज़्म : विकाश विप्लव
चल पड़ा वो शख़्स अपने नन्हे के सरूर का लुत्फ़ उठाए,
ठिठुरती उस शाम में भी, उस खिलखिलाहट का जश्न मनाए।
सहेज रखे थे उसने जो रुपये अपने लिहाफ़ की ख़ातिर…
ख़र्च कर आया वो उन्हें, बिना शिकन का एहसास दिलाए।
खिलौनों को तकती मेरी उन आँखों को तब मालूमात ना था,
कांपते, सर्द रातें वो काटता रहा, मेरी ख़ुशीयों की क़ीमत चुकाए।
बिना ईंधन के दोपहिए पर वो, चलता रहा मुझे लिए सवार
झाँकते रहते पापोश से अँगूठे, तिस पर भी ना वो सकुचाए।
सहर की पहली किरण से जब निकल रहा वो रिज़्क़ की तलाश में,
तके शरीक-ए-हयात तार-तार पीरहन को, मंद-मंद अश्क बहाए।
खोल गिरह, हाथ रख दी रक़म, जो थी नागहानी की ख़ातिर…
पस-ए-शाम देख लाडले को, सारा माज़रा वो समझ मुस्काए।
दूद की बदहवासी में भी सुलगाती रही जो अपनी अंगीठी,
अपने हिस्से की भी दे रोटी वो इठलाती फिरती ही जाए।
शब के पिछले पहर जब, ख़ाब देख कभी घबराता था,
खींच आंचल में अपने वो माँ, धीमे से दे थपकी सुलाए।
भाँप बैठे ऐ 'विप्लव' को, ना कभी ये तक एहसास हुआ,
मुश्किलें सभी मेरे ज़ीस्त की वो ख़ामोशी से रहे सुलझाए।