वो मधुर आवाज़
सुनी मैंने एक मधुर धुन,
और सुनती ही गई उसे दिन-भर,
वो आवाज़ कुछ ख़ास थी,
उसमें जाने कैसी आस थी।
उसने मेरे कोमल मन को
झंकृत कर भावुक कर दिया,
हर शब्द ने जैसे मन के भीतर
कोई मौन स्पंदन भर दिया।
उस आवाज़ में स्पष्टता थी,
हर शब्द में एक ठहराव था,
जैसे कोई अनकहा भाव
धीरे-धीरे मुझसे कह रहा था।
उस मधुर ध्वनि में
मन की कुछ ख़्वाहिशें थीं,
कुछ अधूरी-सी आशाएँ थीं,
और जीवन की सच्चाइयाँ थीं।
उसमें जीवन का सार था,
भावों का अथाह विस्तार था,
जैसे शांत समुद्र की गहराई में
अनगिनत रहस्य समाहित हों,
वैसी ही गहराई
उस आवाज़ में समाई थी।
मन करता था उसे
हज़ारों-लाखों बार सुनूँ,
पर हर बार सुनकर भी
मन कहता—एक बार और सुनूँ।
न जाने क्या था उस आवाज़ में,
जो मन को बाँधे जाती थी,
करोड़ों बार सुन लेने पर भी
सुनने की चाह कम न होती थी।
वो केवल एक आवाज़ नहीं थी,
एक मधुर एहसास थी—
जिसमें आस भी थी,
और मेरे मन की
कोई अनकही बात भी थी।