Hindi Quote in Religious by ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़

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शुभ संध्या वंदन आरती श्री राम शुभ मंगलवार
ब्रह्मदत्त
आरती श्री राम
आरती श्री राम
ब्रह्मदत्त-त्यागी
ब्रह्मदत्त-त्यागी
जय श्रीराम जय श्रीराम जय बजरंगबली हनुमान
संध्या वंदन मंगलवार ब्रह्मदत्त त्यागी
शुभ मंगलवार जय श्रीराम जय श्रीराम ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़ का आपको बारंबार जय श्रीराम जय श्रीराम जय बजरंगबली हनुमान... राम जी के पूर्ण कभी काज नहीं होते... राम के जो भक्त हनुमान नहीं होते... यह आज की संध्या आरती श्री राम आरती ब्रह्मदत्त
श्री रामचन्द्रजी की आरती
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं|
नवकंज लोचन, कंजमुख, करकुंज, पदकंजारुणं ||
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं॥
श्री राम श्री राम....
कंदर्प अगणित अमित छबि, नवनीलनीरद सुन्दरं ।
पट पीत मानहु तडीत रुचि शुचि नौमि जनक
सुतावरं||
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं|
श्री राम श्री राम....
भजु दीनबंधु दिनेश दानवदैत्यवंशनिकंदनं|
'रघुनंद आंनदकंद कोशलचंद दशरथनंदनं ।।
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं।
श्री राम श्री राम...
सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अंग विभुषणं|
आजानु भुजा शरा चाप धरा, संग्राम जित खर दुषणं
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं|
श्रीराम श्री राम...
'इति वदित तुलसीदास शंकरशेषमुनिमनरंजनं ।।
मम हृदयकंजनिवास कुरु, कमदिखल दल गंजनं |
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं
नवकंज लोचन, कंजमुख, करकुंज, पदकंजारुणं ||
श्री राम श्री राम...
आरती के अंत में फिर भगवान श्रीराम को बारंबार प्रणाम नमन नमस्कार जय श्रीराम
जय श्रीराम जय श्रीराम जय बजरंगबली हनुमान
ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़

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गांव की ज़िंदगी – सुकून का असली घर
गांव की ज़िंदगी – सुकून का असली घर

सुबह की पहली किरण जैसे ही खेतों पर पड़ती, पूरा गांव सुनहरी रोशनी से जगमगा उठता। पक्षियों की मधुर चहचहाहट, मंदिर की घंटियों की आवाज़ और ठंडी हवा मन को एक अलग ही शांति देती थी।

शहर में रहने वाली अनन्या कई साल बाद अपने दादा-दादी के गांव आई थी। शहर की भागदौड़, ट्रैफिक और मोबाइल की दुनिया में वह खुद को थका हुआ महसूस करती थी। गांव पहुंचते ही उसने देखा—हर चेहरे पर मुस्कान थी, हर घर का दरवाज़ा खुला था और हर इंसान एक-दूसरे का हाल पूछ रहा था।

एक सुबह दादाजी उसे खेतों में ले गए। हरी-भरी फसलें हवा के साथ झूम रही थीं। किसान मेहनत कर रहे थे, लेकिन उनके चेहरों पर संतोष साफ दिखाई दे रहा था।

अनन्या ने पूछा, "दादाजी, यहां लोगों के पास शहर जैसी सुविधाएं तो नहीं हैं, फिर भी ये इतने खुश कैसे हैं?"

दादाजी मुस्कुराए और बोले, "बेटी, खुशी बड़ी-बड़ी इमारतों में नहीं, बल्कि संतोष, अपनापन और प्रकृति के साथ जीने में होती है।"

उस दिन अनन्या ने बच्चों के साथ मिट्टी में खेला, पेड़ों की छांव में बैठकर कहानियां सुनीं, तालाब किनारे सूर्यास्त देखा और रात को खुले आसमान में अनगिनत तारों को निहारा।

जब वापस शहर लौटने का समय आया, तो उसके दिल में एक नई सोच जन्म ले चुकी थी। उसने समझ लिया कि जीवन का असली सुख केवल पैसा कमाने में नहीं, बल्कि अपनों के साथ बिताए गए पलों और प्रकृति के करीब रहने में है।

उसने तय किया कि चाहे वह शहर में रहे, लेकिन गांव की सादगी, प्रेम और शांति को हमेशा अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखेगी।

सीख:
"सच्ची खुशी वहीं मिलती है, जहां मन को शांति, रिश्तों में अपनापन और प्रकृति का साथ मिलता है। गांव की सादगी ही जीवन की सबसे बड़ी दौलत है।" 🌿🌾

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