रचना- सब भूल गये
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अजीब बोझ मन पर होता है ,
जब उदासी घेर लेती है ।
बिते हुये दिनो की यादें सुहानी ,
आंखों को नम कर जाती है ।।
अपनो में रहना मन चाहता है ,
अब बात यह है की हर कोई ।
एक दूसरे से दूर रह कर ही ,
अपनापन जताना चाहता है ।।
परिवार का एक होना है जरूरी ,
आसान हो जाती है मुश्किलें ।
लड़ सकते है हम हर लड़ाई ,
दोस्तों मानो है बात बड़ी खरी ।।
लोग बदल गए, दिन बदल गए ,
नई सोच से सब कितने बदल गए ।
साथ देनेवाला संकट मे काम आए ,
बात यह आज सब क्यूं भूल गए ।।
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अरुण वि.देशपांडे-पुणे