उलझनों में फँसा मुसाफ़िर था, रास्ता न मिला...
चीख़ता रहा दुनिया से, पर अपना ही साया न मिला....
खुद को साबित करता रहा हर एक मोड़ पे, हर जगह....
लोग मिले बहुत से मगर दिल का हमसाया न मिला....
दर्द की आग में जलता रहा मैं हर एक रोज़....
तकलीफ़ों से लड़ते-लड़ते कोई सहारा न मिला....
भीतर ही भीतर बिखरता रहा ख़ामोशी के साथ....
हँसता रहा चेहरों में, पर मन का साया न मिला....
फिर धैर्य का हाथ थामा, मन को ठहरने दिया....
चुप रहना सीखा जब शोर में कुछ फायदा न मिला...
ना हर किसी को जवाब दिया, ना खुद को साबित किया....
जो सुकून चारों ओर ढूँढा, वो बाहर न मिला....
आख़िर झुककर देखा जब अपने ही अंदर “ये मुसाफ़िर”...
जिसे उम्र भर खोजता रह दर बदर, वही खुद में ही मिला.....
–संकेत गावंडे .