हर बच्चे का बचपन आसान नहीं होता,
यह कलयुग है यहाँ हर मंदिर में भगवान नहीं होता,
सबका घर आबाद नहीं होता,
कुछ डरते हैं स्कूल से वापस आने में, हर बच्चे का डर मोटी-मोटी किताब नहीं होता,
सबके दूर-दूर तक रिश्तेदार नहीं होते,
सबके वो तीन खास यार नहीं होते,
सबकी माँ प्यार नहीं कर पाती, सबके पिता ज़िम्मेदार नहीं होते,
कुछ लोगों के घर में भी अजनबी रहते, हर किसी के घर वाले परिवार नहीं होते।
जिसने पेट भरा हो माँ के बलिदानों से, जिसने बाप का गुस्सा पिया होगा,
जिसने हर महीने अपनी परवरिश का आँसुओं से किराया दिया होगा,
उस बच्चे ने भला कैसा बचपन जिया होगा?
पर बचपन उसे भी याद रहता है जो भुलाना चाहता है,
इतिहास दोहराता होगा कभी-कभार, बचपन बार-बार दोहराता है।"