कोई एक व्यक्ति से हमें बुरा अनुभव होता है,
फिर हम सभी इंसानों को बूरा समझने लगे,
तो फिर गलतियां हमसे ही होगी।
हर एक इंसान में अच्छाई या बुराई ही पनपतीं है,
वह ग़लत बात है।
किसी में अच्छाई भी पनपतीं है तो किसी में बुराई।
अच्छे इंसानों पर भी आप भी बूरे होगे,
वह प्रश्न कब पैदा होता है।
मालूम है?
जब बुराई अच्छाई का नक़ाब पहनकर पहले पास आती है,
फिर वह अपने वास्तविक रूप में आकर असली रूप दिखलातीं है।
तब वह पीड़ित इंसान,
सभी अच्छे इंसानों को भी बूरा समझने लगता है।
किन्तु कुछ विवेक शक्ति भी होनी चाहिए,
अच्छाई और बुराई को समझने की।
एक बार धोखा खाए हुए इंसान में वह समझ अच्छी तरह आ जानी चाहिए।
रावण ने सीतामाता का हरण,
साधु वेश धारण करके किया,
वह रावण की नियत और सोच खराब थी,
साधु और साधुत्व नही।
इसलिए जिंदगी में नक़ाब पहनें मिलते रहते हैं चहेरे,
आज़मा लेना चाहिए जरुर, असलियत के दिख जाते है चहेरे।