Hindi Quote in Poem by softrebel

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बेटियां

होठों की हँसी, चेहरे की किलकारियाँ,
आँगन में बन के चहचहाए वो चिड़िया।
नटखट नदियों-सी,सुगंधित फूलों की क्यारियां,
अपने संस्कारों से पैरों को पखारती है,
बस ऐसी होती है बिटिया
कलेजे का टुकड़ा आँखों की पुतलियाँ।


माथे पे आँचल, हाथों में मेहंदी रची,
हल्दी के रंग में आज रंगी है वो गुड़िया।
लोरियों में पली, सपनों में ढली,
आज किसी और के घर की है वो धूपिया।

होठों की हँसी, चेहरे की किलकारियाँ,
आँगन में बन के चहचहाए वो चिड़िया।
नटखट नदियों-सी,सुगंधित फूलों की क्यारियां,
अपने संस्कारों से पैरों को पखारती है,
बस ऐसी होती है बिटिया
कलेजे का टुकड़ा आँखों की पुतलियाँ।

माँ की दुआ बन हर साँस में बहती है,
पापा की उम्मीद पलकों में चमकती है।
भाई-बहन, सखियों की हँसी साथ लिए,
हर रिश्ते में वो अपनी खुशबू बिखेरती है।

होठों की हँसी, चेहरे की किलकारियाँ,
आँगन में बन के चहचहाए वो चिड़िया।
नटखट नदियों-सी,सुगंधित फूलों की क्यारियां,
अपने संस्कारों से पैरों को पखारती है,
बस ऐसी होती है बिटिया
कलेजे का टुकड़ा आँखों की पुतलियाँ।

वो जा तो रही है, पर दूर नहीं हो रही ,
दो घरों की रौशनी बन दो आँगनों में चमक रही है।
एक घर की धड़कन, दूजे की सुबह,
हर दिल के आसमान में अपनी जगह लालिमा सी बिखेर रही है।
होगा ये घर कल उदास,
पर आज इस घर के हर कोने में अंजोरिया सी पसर रही है।

होठों की हँसी, चेहरे की किलकारियाँ,
आँगन में बन के चहचहाए वो चिड़िया।
नटखट नदियों-सी,सुगंधित फूलों की क्यारियां,
अपने संस्कारों से पैरों को पखारती है,
बस ऐसी होती है बिटिया
कलेजे का टुकड़ा आँखों की पुतलियाँ।
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#betiyan

Hindi Poem by softrebel : 112020090
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गांव की ज़िंदगी – सुकून का असली घर
गांव की ज़िंदगी – सुकून का असली घर

सुबह की पहली किरण जैसे ही खेतों पर पड़ती, पूरा गांव सुनहरी रोशनी से जगमगा उठता। पक्षियों की मधुर चहचहाहट, मंदिर की घंटियों की आवाज़ और ठंडी हवा मन को एक अलग ही शांति देती थी।

शहर में रहने वाली अनन्या कई साल बाद अपने दादा-दादी के गांव आई थी। शहर की भागदौड़, ट्रैफिक और मोबाइल की दुनिया में वह खुद को थका हुआ महसूस करती थी। गांव पहुंचते ही उसने देखा—हर चेहरे पर मुस्कान थी, हर घर का दरवाज़ा खुला था और हर इंसान एक-दूसरे का हाल पूछ रहा था।

एक सुबह दादाजी उसे खेतों में ले गए। हरी-भरी फसलें हवा के साथ झूम रही थीं। किसान मेहनत कर रहे थे, लेकिन उनके चेहरों पर संतोष साफ दिखाई दे रहा था।

अनन्या ने पूछा, "दादाजी, यहां लोगों के पास शहर जैसी सुविधाएं तो नहीं हैं, फिर भी ये इतने खुश कैसे हैं?"

दादाजी मुस्कुराए और बोले, "बेटी, खुशी बड़ी-बड़ी इमारतों में नहीं, बल्कि संतोष, अपनापन और प्रकृति के साथ जीने में होती है।"

उस दिन अनन्या ने बच्चों के साथ मिट्टी में खेला, पेड़ों की छांव में बैठकर कहानियां सुनीं, तालाब किनारे सूर्यास्त देखा और रात को खुले आसमान में अनगिनत तारों को निहारा।

जब वापस शहर लौटने का समय आया, तो उसके दिल में एक नई सोच जन्म ले चुकी थी। उसने समझ लिया कि जीवन का असली सुख केवल पैसा कमाने में नहीं, बल्कि अपनों के साथ बिताए गए पलों और प्रकृति के करीब रहने में है।

उसने तय किया कि चाहे वह शहर में रहे, लेकिन गांव की सादगी, प्रेम और शांति को हमेशा अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखेगी।

सीख:
"सच्ची खुशी वहीं मिलती है, जहां मन को शांति, रिश्तों में अपनापन और प्रकृति का साथ मिलता है। गांव की सादगी ही जीवन की सबसे बड़ी दौलत है।" 🌿🌾

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