मैं और मेरे अह्सास
दुनियादारी
दुनिया की धरेड से निकलना चाह्ता हूँ l
और ख़ुद ही खुद ही में ढलना चाह्ता हूँ ll
किसी ओर को बदलने से बहेतर है कि l
सब से पहले खुद को बदलना चाहता हूँ ll
जहाँ में इंसान मुखौटा पहने घूमता है तो l
दूसरों से पहले खुद समझना चाहता हूँ ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह